पढ़ें' अमन अक्षर के लिखे दिल छू लेने वाले मुक्तक

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अमन अक्षर के मशहूर मुक्तक



ये समय इक अनूठा उपन्यास है जिसमें अपना भी होना अनायास है। प्यास का ये सफ़र है बड़ी दूर का, जबकि घर तो नदी के बहुत पास है।



चिट्ठियों में बनाया नगर प्यार का ज़िन्दगी में बसाया नहीं जा सका कितनी बातें लिखीं की लिखीं रह गईं गीत में कुछ भी गाया नहीं जा सका



तोड़कर कोई मानक नहीं आये हैं अपने हिस्से कथानक नहीं आये हैं। ज़िन्दगी ने मुसलसल पुकारा हमें, अब यहाँ तक अचानक नहीं आये हैं।


प्यार अंधियार था तो अँधेरे हुए ऐसे कितने हैं जिनके सवेरे हुए। हम तो दुनिया से कबके रिहा हो गए, ये तेरे लोग हैं हमको घेरे हुए।


सब यहाँ ख़ुशनुमा था कि तुम आ गये इक ठिकाना जमा था कि तुम आ गये। फिर तुम्हारे बिना तुमपे मरने का ये, सिलसिला बस थमा था कि तुम आ गये।


कौन सी बात थी तुम नहीं आ सके क्या वही बात जो हम नहीं गा सके। तुम भी तन्हाई के चारागर कब हुए, हम भी बीमार को घर नहीं ला सके।


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   बात क़िस्से में कुछ यूँ उतारी गयी

   वक़्त आया मगर अपनी बारी गयी।
  आपने भी तो कुछ हौसला कम रखा,
   इक मोहब्बत तो हमसे भी हारी गयी। 



पहले सीधा सा रस्ता सुझाया हमें फिर कहानी में वापस बुलाया हमें ज़िन्दगी का हुनर ज़िन्दगी को न था एक लड़की ने जीना सिखाया हमें




 प्राण आहत भी होना नहीं चाहिए
   देह अमृत भी होना नहीं चाहिए।
   या मुझे आदमी से वो बेहतर करे,
   या मोहब्बत भी होना नहीं चाहिए।




 प्रेम संवाद था मैं नहीं हो सका
   गीत अनुवाद था मैं नहीं हो सका।
   कब कोई आप अपना सहारा हुआ,
    तू ही अपवाद था मैं नहीं हो सका। 




   मुझमें थी इक विकलता तुम्हारे लिये
   द्वार दीपक सा जलता तुम्हारे लिये।
   और जो होता पता तुम यहीं आओगे,
   मैं न घर से निकलता तुम्हारे लिये।




   युद्ध की ओर बढ़ता तुम्हारे लिये
    जीतता या कि मरता तुम्हारे लिये।
   कुछ सुलह की जो उम्मीद होती तो मैं
,  तुमसे भी बात करता तुम्हारे लिये।


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   सारे करतब दिखाये तुम्हारे लिये 
    कितने चेहरे बनाये तुम्हारे लिये। 
   यूँ तो दुनिया को भी खूब भाये मगर, 
    हम कहानी में आये तुम्हारे लिये।




यूँ तो दोनों को दिन दिन भटकना पड़ा 
प्रीत का मोड़ आया तो रुकना पड़ा 
सारा पौरुष भी जब काम आया नहीं 

एक लड़की को उपवास रखना पड़ा 




 पुण्य भी ढोये अनगिन तुम्हारे लिये
     बिन जिये रह गये दिन तुम्हारे लिये।
   सारी दुनिया गयी जाने किसके लिये,
    हम गये स्वर्ग लेकिन तुम्हारे लिये।

 


 एक जीवन जनम कितने झेला हुआ
     मुझमें शामिल हुआ तो ये मेला हुआ।
    अपने हिस्से का सब मुझको जीते गये,
      मैं अकेला ही था सो अकेला हुआ।




सबकुछ छोड़ चुका था फिर भी मैं तुम तक चलकर आया
     लेकिन जब लौटा तो तुमको ही अपने साथ न ला पाया।
     तुमको भी मुझ बंजारे का साथ कहाँ स्वीकार था,
      जिसने 'हमको' दूर किया था, वो भी अपना प्यार था।



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   मुझको मेरी आवाज़ों ने चलने से पहले टोका था 
    लेकिन तन्हा सोचके तुमको रुकने से भी रोका था। 
     मैं भी था अनजान तुम्हारा अपना इक संसार था,
     जिसने हमको दूर किया था वो भी अपना प्यार था।




जब शिकायत जवाबों से बेहतर लगी फिर कोई शय न ख्वाबों से बेहतर लगी ये भी दुनिया बची है उन्हीं से जिन्हें एक लड़की किताबों से बेहतर लगी




सब जो कहते हैं सुनने की कोशिश में हूँ अब मैं चुप-चाप रहने की कोशिश में हूँ। सब कहा जा चुका कुछ न कहने को है, बस इसी दुःख को कहने की कोशिश में हूँ ।




 वो सफ़र जिसको कोई भी रस्ता न दे
    ग़म न रोये तो फिर इक ख़ुशी रो पड़े । 
    याद आते हुए याद की राह में,
    देखकर वो मेरी ज़िंदगी रो पड़े ।



  तुम न थे मन के सारे मनन व्यर्थ थे
     तुमको देखा नहीं था नयन व्यर्थ थे ।
    तुम बिना ज़िन्दगी के सभी आकलन,
    थे महज़ आकलन आकलन व्यर्थ थे ।


अपनी धरती से अलग प्रवास कुछ भी है नहीं घर ही रण बना तो फिर निकास कुछ भी है नहीं । ऐसा दांव खेलने में ख़ास कुछ भी है नहीं, देश के सिवा हमारे पास कुछ भी है नहीं ।

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कैसा उड़ता हुआ सा है रंग ज़िन्दगी
    इक मुझे छोड़ सबके है संग ज़िन्दगी।
    फ़िक़्र का मैं वो हूँ एक लम्हा जहाँ,
    मुझसे मेरी तरह ही है तंग ज़िन्दगी ।




जितने लगते हैं उतने ही सादा हैं हम हर नज़र से बचाया जो वादा हैं हम यूं किसी के भी हिस्से में कम तो नहीं एक लड़की के थोड़े से ज़्यादा हैं हम


हम जो हो जाते रोती नमीं व्यर्थ थे प्रार्थना में जो होती कमीं व्यर्थ थे। हम अकेले थे सो काम के भी रहे, तुमको पा जाते फिर तो हमीं व्यर्थ थे ।




   तुम उदासी का मतलब समझते नहीं 

     ये तुम्हें भूलने का बहाना भी है 
     इस गुज़रते हुए पल की सोचो ज़रा
     जिसमें गुज़रा हुआ एक जमाना भी है




 इतने निस्सार में ये बड़ी बात है
     ऐसे संसार में ये बड़ी बात है ।
    आप हैं आप में बात है आम ये,
    आप हैं प्यार में ये बड़ी बात है।




 प्यार में घर संवारा नहीं जा सका
    कर्ज़ कोई उतारा नहीं जा सका ।
     हमनें तुमको ही जीवन किया और फिर,
     हमसे जीवन भी हारा नहीं जा सका ।


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 मन का कुछ भी नहीं सांस के योग हैं
     ग़म हो या हो ख़ुशी दोनों ही रोग हैं,
    आप रोती हुई उम्र के साथ हम
      ज़िन्दगी से निभाते हुए लोग हैं ।




उम्र उलझन हुई कोई हल न मिला सौ जनम तप किये कोई फल न मिला, यूँ तो इतिहास में हम अमर हो गए हमको जीवन भरा कोई पल न मिला



प्रीत के एक प्रारूप का सूर्य है मुझको लगता था कि धूप का सूर्य है, सारी दुनिया मेरे मन का अँधियार है हर उजाला तेरे रूप का सूर्य है


रात के सिर लगा घाव है चंद्रमा घाव सहकर बढ़ा भाव है चंद्रमा, वो तुम्हारी कमीं से घिरा दुःख है जो इक उसी दुःख का दोहराव है चंद्रमा


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एक घड़ी में साथ-साथ जैसे दो जन्म रहे
  जिंदगी के साथ जिंदगी से थोड़ा कम रहे,
  थोड़े दिन तो जग में अपने प्यार के भरम रहे,
 फिर बची कहानियां ना तुम रहे ना हम रहे 




आप नदिया के आधार हो जाते हैं जैसे पत्थर से जलधार हो जाते हैं हम अचानक पराये से संसार में एक लड़की का संसार हो जाते हैं




साथ रहना हमें रास आया नहीं
दूरियों ने गले से लगाया नहीं,
कितने जीवन जिए जाएंगे इस तरह,
तुमने अब तक हमें ये बताया नहीं




साथ हंसने लगे तो हंसी कम पड़ी 
रो पड़ी आंख तो फिर नमी कम पड़ी, 
 जब तुम्हारी कमी को ही जीना पड़ा 
जिंदगी में तुम्हारी कमी कम पड़ी 




इतने दूर थे कि दूरियों के मेल हो गए
 हम नगर के पहले ही रुकी सी रेल हो गए,
  अपनी अपनी याद से लिपट के बेल हो गए
  तुम हमारा खेल हम तुम्हारा खेल हो गए 


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अधबसे नगर में अपने ख्वाब लेके आए थे
  हर सवाल का गलत जवाब लेके आए थे,
प्रेम की गली में सब शराब लेके आए थे
 हम बहुत खराब थे किताब लेके आए थे




जो मनाने से मान जाती है उस मुहब्बत की शान जाती है, तुम तो इक दम से उठ के जाते हो इस तरह से तो जान जाती है।


ये हर नयी सी बात पर हंसते हंसाते लोग, अच्छे तो होते हैं मगर प्यारे नहीं होते।


कब कहां इस बहाने से रोते हैं हम साथ के छूट जाने से रोते हैं हम, मौत रोने की मोहलत भी देती नहीं एक जीवन के जाने से रोते हैं हम।


वक़्त कितना लगेगा भला क्या लिखें रास्ता अब तलक जो चला क्या लिखें, हम तो तुमसे बस इक आह भर दूर है कितने मीलों का है फासला क्या लिखें।


उस भली रात का रत जगा क्या लिखें दिल अकेलों का कितना सगा क्या लिखें, हमको 'तन्हाई' में ही हुआ प्यार भी दाग़ पर दाग़ कैसे लगा क्या लिखें।


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जो जनम के साथ दिव्यता के सर्वनाम हैं और जनम से छूटकर भी बन गए प्रणाम हैं, राम देह कर्म भी हैं आत्मा का काम हैं साथ हैं तो 'राम' हैं नहीं तो राम-राम हैं।



इक जनम में सौ जनम की रीतियां निभाईं थीं जिसने सूर्य के लिए भी छतरियां उठाईं थीं सब कसौटियां लखन ने ही स्वयं बनाईं थीं जो लगीं न राम को वो ठोकरें भी खाईं थीं



इतनी सी बस कहानी मगर क्या लिखें उस अधूरे से पल की ख़बर क्या लिखें, जो तुम्हारे शहर ले के जाती हमें रेल तो जा चुकी थी सफ़र क्या लिखें।


ऐसे कामों में थोड़े से पल जाते हैं दिल अगर रख लो दिल भी बहल जाते हैं, इक असर इन दवाओं का इतना है बस ज़ख्म भरते नहीं हैं बदल जाते हैं।


यूं उलझने पे रो रहे थे हम दूर बसने पे रो रहे थे हम तेरे जाने का गम भी है लेकिन अपने हंसने पे रो रहे थे हम


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धूल मिट्टी सने अनमने पांव हैं
वैसे कहने को जीता हुआ दावं हैं
आज फिर रेल रुक कर जो देखी लगा
हम तो शहरों में रहते हुए गावं हैं




 स्वप्न साकार ही ना कर पाए
हार स्वीकार ही ना कर पाए
तुमको देखा था पहली बार जहां
वो गली पार ही ना कर पाए




मेरी राहों से अपना सफर ले गया
 वह बिछड़ कर बिछड़ने का डर ले गया
 मेरी आंखों में तू ना शहर छोड़ कर
 मुझको अपनी दो आंखों में भर ले गया

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