Tuesday, December 17, 2019

कवि प्रमोद तिवारी के बेहतरीन गजल और गीत pramod tiwari ki kavita, shayari

pramod tiwari ki kavitayen
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नमस्कार दोस्तों - आज का यह आर्टिकल कानपुर के मशहूर कवि प्रमोद तिवारी जी की रचनाओं पर आधारित है । प्रमोद तिवारी जी का जन्म 31 जनवरी 1960 को कानपुर के मवईयां गांव में हुआ था ।

 प्रमोद तिवारी जी ने अपने गीतों और कविताओं से लोगों के दिलों में  खास जगह बनाई ,प्रमोद तिवारी गीतकार होने के साथ-साथ एक वरिष्ठ पत्रकार भी थे ।

सलाखों में ख्वाब , और , मैं आवारा बादल , इनकी प्रमुख कृतियां है ।  कवि प्रमोद तिवारी जी का 12 मार्च 2018 को सड़क दुर्घटना में निधन हो गया ।

 तो आइए पढ़ते हैं प्रमोद तिवारी जी की कुछ चुनिंदा रचनाएं ...

pramod tiwari ki kavitayen


प्रमोद तिवारी के चुनिंदा शेर / pramod tiwari shayari,


1. ये सोच के दरिया में ,मैं कूद गया यारों,
   वो मुझको बचा लेगा ,माहिर है बचाने में।


2. आये हो तो आँखों में कुछ देर ठहर जाओ
   इक उम्र गुज़रती है ,इक ख्वाब सजाने में।

3. मुस्करा कर जो सफर में चल पड़े होंगे,
   आज बन कर मील के पत्थर खड़े होंगे।


4. ऐसा क्या है खास तुम्हारे अधरों में,
    ठहर गया मधुमास तुम्हारे अधरों में।

5. लाख था दुश्मन मगर ये कम नहीं था दोस्तों,
    बद्‌दुआओं के बहाने नाम वो लेता तो था।

6. मुझे सर पे उठा ले आसमां ऐसा करो यारों,
   मेरी आवाज में थोडा़ असर पैदा करो यारो।
   यूं सबके सामने दिल खोलकर बातें नही करते,
   बड़ी चालाक दुनिया है जरा समझा करो यारो

 7. बद्दुआ कैसी भी हो वो कभी लगती ही नही
    वरना दुनिया ये कब की राख हो गयी होती

8. कुछ इस तरह से अपनी कहानी हुई तमाम
   अब उसको बेवफा भी कहूँ याद भी करूँ

9. किसी ने छोड़ दिया तो किसी ने थाम लिया
   इसी तरह से मोहब्बत ने सबसे काम लिया

10. जो कहना था , कहा अब और ज्यादा , मुंह को क्या खोलूं
     ज़ुबाँ है तो ज़ुरूरी भी नहीं हर बात पर बोलूं

11. शहर में बियाबान को सह रहा हूँ
    ये मैं ही हूँ जो इस तरह रह रहा हूँ
    भरोसे के काबिल नहीं है ये दुनिया
    भरोसा किया है तभी कह रहा हूँ

12. इक परदा सा पड़ा था हर नज़र धुंधली लगी
    अपनी कालिख देख ली दुनिया बहुत उजली लगी

13. सागर मंथन के बाद देवता हों या दानव बतलाएं
     विष तो घट घट मिल जाता है जो अमृत था वो कहाँ गया

14. वो भी तो नहीं चाहता था सिलसिला चले
      मैंने भी बात ख़त्म की इलज़ाम लगाकर

15. एक भरोसा था जो वो भी धीरे धीरे टूट गया
     हाथों में हो हाथ भले पर रिश्ता था जो छूट गया
    हम दोनों ने कभी कहा था हमको तुमसे प्यार है
   अपने हिस्से सच आया है उसके हिस्से झूठ गया

 16. जो कहना है कहूँगा भी, जो करना है करूँगा भी
     अंधेरो को खलूँगा भी, हवाओं से लडूंगा भी
     न सोचा है मिला क्या है, न सोचूंगा मिलेगा क्या
     दिया हूं तो जलूँगा भी, जलूँगा तो बुझूंगा भी

17. दिल़ में वो महकता है किसी फूल की तरह,
    कांटे की तरह ज़ेहन में जो है चुभा हुआ।

18. ये क्यों कहें दिन आजकल अपने खराब हैं,
    कांटों से घिर गये हैं ,समझ लो गुलाब हैं।

19. कोशिशें सबकी अपनी अपनी हैं
    आखिरी वार करके देखूँगा
    तुम मुझे कितना प्यार करते हो
    मैं तुम्हें प्यार करके देखूंगा

20. मैं कबीर तुलसी का वंशज दरबारों में नहीं मिलूंगा
     सच्ची घटना हूँ मैं तुमको अख़बारों में नहीं मिलूंगा
     मेरी है तलाश तो अपने सर पर बिछी हुई छत देखो
     मैं दिल की हो या आँगन की दीवारों में नहीं मिलूंगा

प्रमोद तिवारी के चुनिंदा दोहे / pramod tiwari shayari,  pramod tiwari ki kavita


1. धूप -धूप चलता रहा ,अब पाई है छाँव।
   मैं तो धरने से रहा उल्टे-सीधे पाँव।

2. सतयुग सत है युगों का,त्रेत़ा एक विधान।
    द्वापर वंशी ज्ञान की कलियुग है विज्ञान।

3. एक भिखारी की तरह सबके फैले हाथ।
    चाहें कोई धर्म हो चाहे कोई जात।

4. बिना पीर आंसू बहें, बिन आंसू के पीर।
    जैसे कान्हां के बिना राधा यमुना तीर।

5.उजियारे को दिन मिला,अंधियारे को रात।
   दोनों ने मिलकर रचा है सारा "उत्पात"।


6. काश समझ पाते अगर तो हम होते साथ।
    इतनी छोटी भी नहीं हर छोटी सी बात।

7. दिन भर तो पहने रहा सूरज का परिधान।
    चन्दा तेरी चांदनी भी क्या लेगी प्राण।

8. कैसा मौसम आ गया , कैसी चली बयार।
    फूल लूटने लग गये कलियों का श्रींगार ।

9. बिना पिए ही घट गयी जिस क्षण मेरी प्यास।
    उस क्षण से बढ़ने लगा घट घट पर विश्वास ।

10. तृप्ति हमें भटका रही सब पानी का फेर।
      प्यास कहे अब घाट चल क्या बकरी क्या शेर।


मेरे मन ने डरते डरते


मेरे मन ने डरते डरते, मुझसे एक प्रश्न पूछा है
जीवन राख समझने वाले, मुझ पर क्यों इतने पहरे हैं
          मेरे ज़ख्म बहुत गहरे हैं

सोच रहा हूँ उत्तर दे दूँ, सारे पहरे वापस ले लूँ
लेकिन यह उन्मुक्त परिंदा उसी डाल पर जा बैठेगा

जहां हमारी थकन, किसी के लिए बिछौना हो जाती है
जहां हमारे बीते दिन की हंसी खिलौना हो जाती है

जहां सभी आदर्श सघन छाया पाते ही सो जाते हैं
और स्मृति में साथ किसी के हम हिंसक पशु हो जाते हैं

इसीलिए अब सोच रहा हूँ, पहरे और सख्त कर डालूँ,
साथ-साथ यह भी बतला दूँ। रे मन,
तू मनहै, मन ही रह-काया के अपने घेरे हैं,
उसके ज़ख्म बहुत गहरे हैं।


याद बहुत आते हैं गुड्डे- गुड़ियों वाले दिन


याद बहुत आते हैं गुड्डे- गुड़ियों वाले दिन
दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन
ओलम, इमला, पाटी, बुदका खड़ियों वाले दिन,
बात-बात में फूट रही फुलझड़ियों वाले दिन

पनवाड़ी की चढ़ी उधारी घूमे मस्त निठल्ले
कोई मेला--हाट न छूटे टका नहीं है पल्ले,
कॉलर खड़े किए हाथों में घड़ियों वाले दिन
ट्रांजिस्टर पर हवामहल की कड़ियों वाले दिन

लिख-लिख, पढ़-पढ़ चूमें-फाड़ें बिना नाम की चिट्ठी
सुबह दुपहरी शाम उसी की बातें खट्टी-मिट्ठी,
रुमालों में फूलों की पंखुड़ियों वाले दिन
हड़बड़ियों में बार-बार गड़बड़ियों वाले दिन

सुबह-शाम की डंड-बैठकें दूध पिएं भर लोटा
दंगल की ललकार सामने घूमें कसे लंगोटा,
मोटी-मोटी रोटी घी की भड़ियों वाले दिन
गइया, भैंसी, बैल, बकरियाँ पड़ियों वाले दिन

दिन-दिन बरसे पानी भीगे छप्पर आँखें मींचे
बूढ़ा दबा रही हैं झाडू सिलबट्टा के नीचे
टोना सब बेकार जोंक, मिचकुड़ियों वाले दिन,
घुटनों-घुटनों पानी फुंसी-फुड़ियों वाले दिन

घर भीतर मनिहार चढ़ाए चुड़ियां कसी-कसी सी
पास खड़े भइया मुसकाएं भौजी फंसी-फंसी सी,
देहरी पर निगरानी करतीं बुढ़ियों वाले दिन
बाहर लाठी-मूंछें और पगड़ियों वाले दिन

तेज धार करती बंजारन चक्का खूब घुमाए
दाब दांत के बीच कटारी मंद-मंद मुसकाए,
पूरा गली-मोहल्ला घायल छुरियों वाले दिन
छुरियों छुरियों छूट रही छुरछुरियों वाले दिन

‘शोले’ देख छुपा है ‘वीरू’ दरवाजे के पीछे
चाचा ढूंढ रहे हैं बटुआ फिर तकिया के नीचे,
चाची बेंत छुपाती घूमें छड़ियों वाले दिन
हल्दी गर्म दूध के संग फिटकरियों वाले दिन

ये वो दिन थे जब हम लोफर आवारा कहलाए
इससे ज्यादा इस जीवन में कुछ भी कमा न पाए,
मंहगाई में फिर से वो मंदड़ियों वाले दिन
कोई लौटा दे चूरन की
पुड़ियों वाले दिन

नदिया धीरे-धीरे बहना


नदिया धीरे-धीरे बहना नदिया घाट-घाट से कहना,
मीठी-मीठी है मेरी धार खारा-खारा है सारा संसार

तुझको बहते जाना है सागर का घर पाना है
सागर से पहले तुझको गागर-गागर जाना है,
सागर की बहना नदिया गागर से कहना नदिया
गति में है जीवन का श्रृंगार बांधो न पावों में दीवार

रस्ते मुश्किल होते हैं फिर भी हासिल होते हैं
बहते पानी के संग-संग प्यासों के दिल होते हैं,
बहना,बस बहना नदिया
कुछ भी हो सहना नदिया
सब पे लुटाना  अपना प्यार
कहना  इसको कहते हैं धार

सीमाएं क्या होती हैं कैसे तोड़ी जाती हैं
तोड़ी सीमाएं फिर से कैसे जोड़ी जाती हैं,
सबको समझाना नदिया
सबको बतलाना नदिया
सीमाओं में भी है विस्तार
साधो न लहरों पर तलवार

प्रचलित गतियों से बचना अपना पथ खुद ही रचना
अपनी रचना में तुमको झलकेंगी गंगा-जमुना,
अपना पथ अपना होगा
अपना रथ अपना होगा
अपनी ही होगी फिर रफ़्तार
अपनी कश्ती अपनी पतवार

सागर के घर जब जाना थोडा सोना सुस्ताना
स्थिरता का सुख क्या है
इसकी तह तक भी जाना,
किरणें सर पर नाचेंगी
सूरज का ख़त बाचेंगी
ख़त में होगा जीवन का सार
लेना फिर बादल का अवतार

नदिया धीरे-धीरे बहना नदिया घाट-घाट से कहना ..
मैं ही हूँ बादल का अवतार फिर मैं गाऊंगा गीत मल्हार


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हम तो पिंजरों को परों पर रात-दिन ढोते नहीं


हम तो पिंजरों को परों पर रात-दिन ढोते नहीं,
आदमी हैं -हम किसी के पालतू तोते नहीं

क्यों मेरी आँखों में आँसू आ रहे हैं आपके
आप तो कहते थे कि पत्थर कभी रोते नहीं।

आप सर पर हाथ रखकर खा रहे हैं क्यों कसम,
जिनके दामन पाक हों वो दाग को धोते नहीं

ख्वाब की चादर पे इतनी सिलवटें पड़ती नहीं,
हम जो सूरज के निकलने तक तुम्हें खोते नहीं

दिल के बटवारे से बन जातीं हैं घर में सरहदें,
कि सरहदों से दिल के बटवारे कभी होते नहीं

क्यों अँधेरों की उठाये घूमते हो जूतियाँ,
क्यों चिरागों को जलाकर चैन से सोते नहीं

हम तो पिंजरों को परों पर रात-दिन ढोते नहीं,
आदमी हैं- -हम किसी के पालतू तोते नहीं

राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं


राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं
आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं रिश्तों की खुशबू से नहलाते हैं

मेरे घर के आगे एक खिड़की थी, खिड़की से झांका करती लड़की थी,
इक रोज मैंने यूँ हीं टाफी खाई, फिर जीभ निकाली उसको दिखलाई,
गुस्से में वो झज्जे पर आन खड़ी, आँखों ही आँखों मुझसे बहुत लड़ी,
उसने भी फिर टाफी मंगवाई थी,आधी जूठी करके भिजवाई थी
वो जूठी अब भी मुँह में है, हो गई सुगर हम फिर भी खाते हैं
राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं

दिल्ली की बस थी मेरे बाजू में, इक गोरी-गोरी बिल्ली बैठी थी,
बिल्ली के उजले रेशम बालों से, मेरे दिल की चुहिया कुछ ऐंठी थी,
चुहिया ने उस बिल्ली को काट लिया, बस फिर क्या था बिल्ली का ठाट हुआ,
वो बिल्ली अब भी मेरे बाजू है, उसके बाजू में मेरा राजू है
अब बिल्ली,चुहिया,राजू सब मिलकर मुझको ही मेरा गीत सुनाते हैं
राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं

एक दोस्त मेरा सीमा पर रहता था, चिट्ठी में जाने क्या-क्या कहता था,
उर्दू आती थी नहीं मुझे लेकिन, उसको जवाब उर्दू में देता था,
एक रोज़ मौलवी नहीं रहे भाई, अगले दिन ही उसकी चिट्ठी आई,
ख़त का जवाब अब किससे लिखवाता, वह तो सीमा पर रो-रो मर जाता
हम उर्दू सीख रहे हैं नेट-युग में, अब खुद जवाब लिखते हैं गाते हैं
राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं

इक बूढ़ा रोज गली में आता था, जाने किस भाषा में वह गाता था,
लेकिन उसका स्वर मेरे कानों में, अब उठो लाल कहकर खो जाता था,
मैं,निपट अकेला खाता सोता था, नौ बजे क्लास का टाइम होता था,
एक रोज ‘मिस’नहीं मेरी क्लास हुई, मैं ‘टाप’ कर गया पूरी आस हुई
वो बूढ़ा जाने किस नगरी में हो, उसके स्वर अब भी हमें जगाते हैं
राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं

इन राहों वाले मीठे रिश्तों से, हम युगों-युगों से बँधे नहीं होते,
दो जन्मों वाले रिश्तों के पर्वत,अपने कन्धों पर सधे नहीं होते,
बाबा की धुन ने समय बताया है, उर्दू के खत ने साथ निभाया है,
बिल्ली ने चुहिया को दुलराया है, जूठी टाफी ने प्यार सिखाया है
हम ऐसे रिश्तों की फेरी लेकर, गलियों-गलियों आवाज लगाते हैं,
राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं

राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं,
आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं रिश्तों की खुशबू से नहलाते हैं

चौदह बरस राम के होंगे


चौदह बरस राम के होंगे
यहाँ रोज़ बनवासी जीवन
सारे भोग अभोगे से हैं
काट दिया सन्यासी जीवन
.
बिना भेद के जीते -जीते
जितने थे सब भेद मिल गए
बड़े बड़े सन्सारी बंधन
बिना छुए ही स्वतः खुल गए,
नेह,मोह,माया के चरणों
पड़ा मिला अधिशाषी जीवन
.
भरी जवानी थाह नापने के
सारे पैमाने छोटे
बावजूद गहरी गहरी डुबकी के भी
खाली ही लौटे,
अब ढलान पर लगा लुढ़कने
नट जैसा अभ्यासी जीवन
.
सजी सजाई जीवन शैली
अब विचार की मुद्रा में हैं
और देह पीड़ा की शैया बनीं
भीष्म की निद्रा में है,
समझ रहा था अपना है सब
निकला मगर प्रवासी जीवन

अँधियारा है बहुत यहाँ,


अँधियारा है बहुत यहाँ, अब तुम दहलो या मैं दहलू,
औ एक कहानी उजियारो की तुम कह लो या मैं कह लूँ

जिन लहरोँ पर हम तिरते थे वे दरिया में डूब गयीं,
और डूबी लहरोँ पर चाहे अब तुम बह लो या मैं बह लूँ 

ज़ख्म भले ही अलग-वलग हो, लेकिन दर्द बराबर है,
कोई फर्क नहीं पड़ता है, तुम सह लो या मैं सह लूं

आँखों की दहलीज़ पे आके, सपना बोला आंसू से,
कि घर तो आखिर घर होता है, तुम रह लो या मैं रह लूँ

चाँद तुम्हें देखा है पहली बार


चाँद तुम्हें देखा है पहली बार
ऐसा क्यों लगता मुझको हर बार

कभी कटोरा लगे दूध का कभी बर्फ का टुकड़ा
कभी रुई के फागे जैसा गोरा--गोरा मुखड़ा,
तेरी उपमाओं को देखे ठगा--ठगा संसार

लुका--छिपी का खेल खेलती जैसे कोई लड़की
आसमान से झांक रही है खोले घर की खिड़की,
उस खिड़की से तेरे संग--संग झाँके मेरा यार

बादल के घूँघट से बाहर जब भी तू निकला है
मैं क्या मेरे साथ समन्दर तक मीलों उछला है,
आसन पर बैठे जोगी को जोग लगे बेकार

रूप तुम्हारा एक मगर वो सौ--सौ रंग दिखाये
कोई देख तुझे व्रत खोले कोई ईद मनाये,
घटता बढ़ता रूप ये तेरा तय करता त्योहार

अब तू मुझको पूरा--पूरा नजर नहीं आता है
छज्जे के आगे बिल्डिंग का टॉवर पड़ जाता है,
बच्चे भी मामा कहने को तुझे नहीं तैयार

मेरी आवारा रातों को तूने दिया सहारा
तू ना सोया वरना तो दुनिया ने किया किनारा
तू भी सो जाता तो मेरा क्या होता सरकार

चाँद तुम्हें देखा है पहली बार
ऐसा क्यों लगता मुझको हर बार

इन दिनों मसरूफ हूँ ,बा -होश


इन दिनों मसरूफ हूँ ,बा -होश थोड़ा काम से
वरना कैसी मय से तौबा , कैसी तौबा जाम से,

चाल मेरी देख कर साया भी मेरा जल उठा
अब सफर में रोशनी है और मैं आराम से,

प्यार में या दुशमनी में कुछ इज़ाफ़ा है ज़रूर
वरना ये आवाज़ कैसी सीधे--सीधे नाम से,

क्यू चले आते हैं छत पे देखने कैसा है चाँद
भीड़ लग जाती है नुक्कड़ पर गली में शाम से,

एक टुकड़ा धूप का हम भी चुरा लाते अगर
रात के संग- -संग गुज़र जाते नहीं गुमनाम से,

हो भी सकता हैं सियासत से भला हो जाय पर
ये सियासतनदां न बाज आएंगे कत्ले आम से

ना ही ज़्यादा कोशिशें हैं ,ना ही ज्यादा तिकड़में
काम मेरा चल रहा है बस तुम्हारे नाम से,

अगर देश से प्यार करते हो


अगर देश से प्यार करते हो , पंडित
 अगर मुल्क से है मोहब्बत मियां तो
तुम्हें राग अपना बदलना पड़ेगा
बहुत हो चुका अब सँभलना पड़ेगा

 अगर अब न संभले ,अगर अब न बदले
तो सब फूंक देंगे , सियासत में पुतले
 न हिन्दू ,न मुस्लिम, न अगड़े ,न पिछड़े
 ये वोटों की गिनती हैं , कौमों में झगड़े,
अभी और कितना झगड़ना पड़ेगा
बसें गांव को फिर उजड़ना पड़ेगा

न कुरआँ पढा है - न गीता पढ़ी है
पढ़ी है तो बस चोटी-ढाढी पढ़ी है
लिखा जो नहीं वो पढ़ाया गया है
हर इक हर्फ में बरगलाया गया है,
किताबों को फिर से पलटना पड़ेगा
जहालत से आगे निकलना पड़ेगा

मुसीबत तो यह है कि रहना है संग में
अगर बाढ़ आई तो बहना है संग में
ठिकाना तुम्हारा , कहीं ना हमारा
मैं मंदिर का मारा ,तू मस्ज़िद का मारा,
यही सच है इसको निगलना पड़ेगा
ज़हर जो भरा है उगलना पड़ेगा

ये माना कि अब अपनी पटती नहीं है
मगर रात तन्हा भी कटती नहीं है
अकेले में मिलने से कटतेे लगे हैं
जुलूसों में पर्चों सा बंटने लगें हैं,
अभी और कितना भटकना पड़ेगा
जुलूसों में पर्चों सा बांटना पड़ेगा

न सूरज अलग है ,न चन्दा अलग है
न रोटी अलग है , न धंधा अलग है
जो हम ईंट पर ईंट रख दें , महल हैं
सभी धर्म ग्रंथों की पावन रहल हैं,
जहर जो भरा है उगलना पड़ेगा
सियासत के आगे निकलना पड़ेगा

रूप आ गया गहने सभी उतार के


रूप आ गया गहने सभी उतार के
सारे मानक टूट गए श्रृंगार के,

ना बेंदी ना  झुमका पायल
ना कंगन ना गजरा
ना लाली, ना मेहंदी माहुर
न सेंदुर ना कजरा
केवल नयन नशीले दो स्वीकार के,
सारे मानक टूट गए श्रृंगार के

ना उधौ से लेना कुछ भी
ना माधव का देना
फिर भी पीछे पड़ी हुई है
कामदेव की सेना
शत्रु हो गए दर्पण कुल संसार के,
सारे मानक टूट गए श्रृंगार के

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