Wednesday, March 30, 2022

पढ़ें, हार्ट टचिंग लव स्टोरी, | heart touching love story in hindi | very sad love story

heart touching love story in hindi
really heart touching love story in hindi

really heart touching love story in hindi / रुलाने वाली लव स्टोरी

heart touching love story in hindi ट्रेन चलने को ही थी कि अचानक कोई जाना पहचाना सा चेहरा जर्नल बोगी में आ गया। मैं अकेली सफर पर थी। सब अजनबी चेहरे थे। स्लीपर का टिकिट नही मिला तो जर्नल डिब्बे में ही बैठना पड़ा। मगर यहां ऐसे हालात में उस शख्स से मिलना। जिंदगी के लिए एक संजीवनी के समान था।

जिंदगी भी कमबख्त कभी कभी अजीब से मोड़ पर ले आती है। ऐसे हालातों से सामना करवा देती है जिसकी कल्पना तो क्या कभी ख्याल भी नही कर सकते ।

वो आया और मेरे पास ही खाली जगह पर बैठ गया। ना मेरी तरफ देखा। ना पहचानने की कोशिश की। कुछ इंच की दूरी बना कर चुप चाप पास आकर बैठ गया। बाहर सावन की रिमझिम लगी थी। इस कारण वो कुछ भीग गया था। मैने कनखियों से नजर बचा कर उसे देखा। उम्र के इस मोड़ पर भी कमबख्त वैसा का वैसा ही था। हां कुछ भारी हो गया था। मगर इतना ज्यादा भी नही।

फिर उसने जेब से चश्मा निकाला और मोबाइल में लग गया।

चश्मा देख कर मुझे कुछ आश्चर्य हुआ। उम्र का यही एक निशान उस पर नजर आया था कि आंखों पर चश्मा चढ़ गया था। चेहरे पर और सर पे मैने सफेद बाल खोजने की कोशिश की मग़र मुझे नही दिखे।

मैंने जल्दी से सर पर साड़ी का पल्लू डाल लिया। बालो को डाई किए काफी दिन हो गए थे मुझे। ज्यादा तो नही थे सफेद बाल मेरे सर पे। मगर इतने जरूर थे कि गौर से देखो तो नजर आ जाए।

मैं उठकर बाथरूम गई। हैंड बैग से फेसवाश निकाला चेहरे को ढंग से धोया फिर शीशे में चेहरे को गौर से देखा। पसंद तो नही आया मगर अजीब सा मुँह बना कर मैने शीशा वापस बैग में डाला और वापस अपनी जगह पर आ गई।

मग़र वो साहब तो खिड़की की तरफ से मेरा बैग सरकाकर खुद खिड़की के पास बैठ गए थे।

मुझे पूरी तरह देखा भी नही बस बिना देखे ही कहा, " सॉरी, भाग कर चढ़ा तो पसीना आ गया था । थोड़ा सुख जाए फिर अपनी जगह बैठ जाऊंगा।" फिर वह अपने मोबाइल में लग गया। मेरी इच्छा जानने की कोशिश भी नही की। उसकी यही बात हमेशा मुझे बुरी लगती थी। फिर भी ना जाने उसमे ऐसा क्या था कि आज तक मैंने उसे नही भुलाया। एक वो था कि दस सालों में ही भूल गया। मैंने सोचा शायद अभी तक गौर नही किया। पहचान लेगा। थोड़ी मोटी हो गई हूँ। शायद इसलिए नही पहचाना। मैं उदास हो गई।

जिस शख्स को जीवन मे कभी भुला ही नही पाई उसको मेरा चेहरा ही याद नही😔

माना कि ये औरतों और लड़कियों को ताड़ने की इसकी आदत नही मग़र पहचाने भी नही😔

शादीशुदा है। मैं भी शादीशुदा हुँ जानती थी इसके साथ रहना मुश्किल है मग़र इसका मतलब यह तो नही कि अपने खयालो को अपने सपनो को जीना छोड़ दूं।

एक तमन्ना थी कि कुछ पल खुल के उसके साथ गुजारूं। माहौल दोस्ताना ही हो मग़र हो तो सही😔

आज वही शख्स पास बैठा था जिसे स्कूल टाइम से मैने दिल मे बसा रखा था। सोसल मीडिया पर उसके सारे एकाउंट चोरी छुपे देखा करती थी। उसकी हर कविता, हर शायरी में खुद को खोजा करती थी। वह तो आज पहचान ही नही रहा..

माना कि हम लोगों में कभी प्यार की पींगे नही चली। ना कभी इजहार हुआ। हां वो हमेशा मेरी केयर करता था, और मैं उसकी केयर करती थी। कॉलेज छुटा तो मेरी शादी हो गई और वो फ़ौज में चला गया। फिर उसकी शादी हुई। जब भी गांव गई उसकी सारी खबर ले आती थी।

बस ऐसे ही जिंदगी गुजर गई।

आधे घण्टे से ऊपर हो गया। वो आराम से खिड़की के पास बैठा मोबाइल में लगा था। देखना तो दूर चेहरा भी ऊपर नही किया...

मैं कभी मोबाइल में देखती कभी उसकी तरफ। सोसल मीडिया पर उसके एकाउंट खोल कर देखे। तस्वीर मिलाई। वही था। पक्का वही। कोई शक नही था। वैसे भी हम महिलाएं पहचानने में कभी भी धोखा नही खा सकती। 20 साल बाद भी सिर्फ आंखों से पहचान ले️..

फिर और कुछ वक्त गुजरा। माहौल वैसा का वैसा था। मैं बस पहलू बदलती रही।

फिर अचानक टीटी आ गया। सबसे टिकिट पूछ रहा था।

मैंने अपना टिकिट दिखा दिया। उससे पूछा तो उसने कहा नही है।

टीटी बोला, "फाइन लगेगा"

वह बोला, "लगा दो"

टीटी, " कहाँ का टिकिट बनाऊं?"

उसने जल्दी से जवाब नही दिया। मेरी तरफ देखने लगा। मैं कुछ समझी नही।

उसने मेरे हाथ मे थमी टिकिट को गौर से देखा फिर टीटी से बोला, " कानपुर।"

टीटी ने कानपुर की टिकिट बना कर दी। और पैसे लेकर चला गया।

वह फिर से मोबाइल में तल्लीन हो गया।

आखिर मुझसे रहा नही गया। मैंने पूछ ही लिया,"कानपुर में कहाँ रहते हो?"

वह मोबाइल में नजरें गढ़ाए हुए ही बोला, " कहीँ नही"

वह चुप हो गया तो मैं फिर बोली, "किसी काम से जा रहे हो"

वह बोला, "हाँ"

अब मै चुप हो गई। वह अजनबी की तरह बात कर रहा था और अजनबी से कैसे पूछ लूँ किस काम से जा रहे हो।

कुछ देर चुप रहने के बाद फिर मैंने पूछ ही लिया, "वहां शायद आप नौकरी करते हो?"

उसने कहा,"नही"

मैंने फिर हिम्मत कर के पूछा "तो किसी से मिलने जा रहे हो?"

वही संक्षिप्त उत्तर ,"नही"

आखरी जवाब सुनकर मेरी हिम्मत नही हुई कि और भी कुछ पूछूँ। अजीब आदमी था । बिना काम सफर कर रहा था।

मैं मुँह फेर कर अपने मोबाइल में लग गई।

कुछ देर बाद खुद ही बोला, " ये भी पूछ लो क्यों जा रहा हूँ कानपुर?"

मेरे मुंह से जल्दी में निकला," बताओ, क्यों जा रहे हो?"

फिर अपने ही उतावलेपन पर मुझे शर्म सी आ गई।

उसने थोड़ा सा मुस्कराते हुवे कहा, " एक पुरानी दोस्त मिल गई। जो आज अकेले सफर पर जा रही थी। फौजी आदमी हूँ। सुरक्षा करना मेरा कर्तव्य है । अकेले कैसे जाने देता। इसलिए उसे कानपुर तक छोड़ने जा रहा हूँ। " इतना सुनकर मेरा दिल जोर से धड़का। नॉर्मल नही रह सकी मैं।

मग़र मन के भावों को दबाने का असफल प्रयत्न करते हुए मैने हिम्मत कर के फिर पूछा, " कहाँ है वो दोस्त?"

कमबख्त फिर मुस्कराता हुआ बोला," यहीं मेरे पास बैठी है ना"

इतना सुनकर मेरे सब कुछ समझ मे आ गया। कि क्यों उसने टिकिट नही लिया। क्योंकि उसे तो पता ही नही था मैं कहाँ जा रही हूं। सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए वह दिल्ली से कानपुर का सफर कर रहा था। जान कर इतनी खुशी मिली कि आंखों में आंसू आ गए।

दिल के भीतर एक गोला सा बना और फट गया। परिणाम में आंखे तो भिगनी ही थी।

बोला, "रो क्यों रही हो?"

मै बस इतना ही कह पाई," तुम मर्द हो नही समझ सकते"

वह बोला, " क्योंकि थोड़ा बहुत लिख लेता हूँ इसलिए एक कवि और लेखक भी हूँ। सब समझ सकता हूँ।"

मैंने खुद को संभालते हुए कहा "शुक्रिया, मुझे पहचानने के लिए और मेरे लिए इतना टाइम निकालने के लिए"

वह बोला, "प्लेटफार्म पर अकेली घूम रही थी। कोई साथ नही दिखा तो आना पड़ा। कल ही रक्षा बंधन था। इसलिए बहुत भीड़ है। तुमको यूँ अकेले सफर नही करना चाहिए।"

"क्या करती, उनको छुट्टी नही मिल रही थी। और भाई यहां दिल्ली में आकर बस गए। राखी बांधने तो आना ही था।" मैंने मजबूरी बताई।

"ऐसे भाइयों को राखी बांधने आई हो जिनको ये भी फिक्र नही कि बहिन इतना लंबा सफर अकेले कैसे करेगी?"

"भाई शादी के बाद भाई रहे ही नही। भाभियों के हो गए। मम्मी पापा रहे नही।"

कह कर मैं उदास हो गई।

वह फिर बोला, "तो पति को तो समझना चाहिए।"

"उनकी बहुत बिजी लाइफ है मैं ज्यादा डिस्टर्ब नही करती। और आजकल इतना खतरा नही रहा। कर लेती हुँ मैं अकेले सफर। तुम अपनी सुनाओ कैसे हो?"

"अच्छा हूँ, कट रही है जिंदगी"

"मेरी याद आती थी क्या?" मैंने हिम्मत कर के पूछा।

वो चुप हो गया।

कुछ नही बोला तो मैं फिर बोली, "सॉरी, यूँ ही पूछ लिया। अब तो परिपक्व हो गए हैं। कर सकते है ऐसी बात।"

उसने शर्ट की बाजू की बटन खोल कर हाथ मे पहना वो तांबे का कड़ा दिखाया जो मैंने ही फ्रेंडशिप डे पर उसे दिया था। बोला, " याद तो नही आती पर कमबख्त ये तेरी याद दिला देता था।"

कड़ा देख कर दिल को बहुत शुकुन मिला। मैं बोली "कभी सम्पर्क क्यों नही किया?"

वह बोला," डिस्टर्ब नही करना चाहता था। तुम्हारी अपनी जिंदगी है और मेरी अपनी जिंदगी है।"

मैंने डरते डरते पूछा," तुम्हे छू लुँ"

वह बोला, " पाप नही लगेगा?"

मै बोली," नही छू ने से नही लगता।"

और फिर मैं कानपुर तक उसका हाथ पकड़ कर बैठी रही।।

बहुत सी बातें हुईं।

जिंदगी का एक ऐसा यादगार दिन था जिसे आखरी सांस तक नही बुला पाऊंगी।

वह मुझे सुरक्षित घर छोड़ कर गया। रुका नही। बाहर से ही चला गया।

जम्मू थी उसकी ड्यूटी । चला गया।

उसके बाद उससे कभी बात नही हुई । क्योंकि हम दोनों ने एक दूसरे के फोन नम्बर नही लिए।

हांलांकि हमारे बीच कभी भी नापाक कुछ भी नही हुआ। एक पवित्र सा रिश्ता था। मगर रिश्तो की गरिमा बनाए रखना जरूरी था।

फिर ठीक एक महीने बाद मैंने अखबार में पढ़ा कि वो देश के लिए शहीद हो गया। क्या गुजरी होगी मुझ पर वर्णन नही कर सकती। उसके परिवार पर क्या गुजरी होगी। पता नही😔

लोक लाज के डर से मैं उसके अंतिम दर्शन भी नही कर सकी।

आज उससे मीले एक साल हो गया है आज भी रखबन्धन का दूसरा दिन है आज भी सफर कर रही हूँ। दिल्ली से कानपुर जा रही हूं। जानबूझकर जर्नल डिब्बे का टिकिट लिया है मैंने।

अकेली हूँ। न जाने दिल क्यों आस पाले बैठा है कि आज फिर आएगा और पसीना सुखाने के लिए उसी खिड़की के पास बैठेगा।

एक सफर वो था जिसमे कोई #हमसफ़र था।

एक सफर आज है जिसमे उसकी यादें हमसफ़र है। बाकी जिंदगी का सफर जारी है देखते है कौन मिलता है कौन साथ छोड़ता है...!!!

लेखक : अज्ञात 

whoever wrote it it's heart teaching ❤️

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train chalane ko hi thi ki achaanak koi jaana pahachaana sa chehara journal bogie mein aa gaya. main akeli safar par thi. sab ajanabi chehare the. sleepar ka tikit nahi mila to journal dibbe mein hi baithana pada. magar yahaan aise haalaat mein us shakhs se milana. jindagi ke liye ek sanjeevani ke samaan tha. 

jindagi bhi kamabakht kabhi kabhi ajeeb se mod par le aati hai. aise haalaaton se saamana karava deti hai jisaki kalpana to kya kabhi khyaal bhi nahi kar sakate . 

vo aaya aur mere paas hi khaali jagah par baith gaya. na meri taraf dekha. na pahachaanane ki koshish ki. kuchh inch ki doori bana kar chup chaap paas aakar baith gaya. baahar saavan ki rimajhim lagi thi. is kaaran vo kuchh bheeg gaya tha. maine kanakhiyon se najar bacha kar use dekha. umr ke is mod par bhi kamabakht vaisa ka vaisa hi tha. haan kuchh bhaari ho gaya tha. magar itana jyaada bhi nahi. 

phir usane jeb se chashma nikaala aur mobile mein lag gaya. 

chashma dekh kar mujhe kuchh aashchary hua. umr ka yahi ek nishaan us par najar aaya tha ki aankhon par chashma chadh gaya tha. chehare par aur sar pe maine safed baal khojane ki koshish ki magar mujhe nahi dikhe. 

mainne jaldi se sar par sari ka pallu daal liya. baalo ko dai kiye kaafi din ho gaye the mujhe. jyaada to nahi the safed baal mere sar pe. magar itane jarur the ki gaur se dekho to najar aa jaye. 

main uthakar baatharoom gai. hand bag se facewas nikaala chehare ko dhang se dhoya phir sheeshe mein chehare ko gaur se dekha. pasand to nahi aaya magar ajeeb sa munh bana kar maine sheesha vaapas bag mein daala aur vaapas apani jagah par aa gai. 


magar vo saahab to khidaki ki taraf se mera bag sarakakar khud khidaki ke paas baith gaye the. 

mujhe puri tarah dekha bhi nahi bas bina dekhe hi kaha, " sorry, bhaag kar chadha to paseena aa gaya tha . thoda sukh jaye phir apani jagah baith jau nga." phir vah apane mobile mein lag gaya. meri ichchha jaanane ki koshish bhi nahi ki. usaki yahi baat hamesha mujhe buri lagati thi. phir bhi na jaane usame aisa kya tha ki aaj tak mainne use nahi bhulaaya. ek vo tha ki das saalon mein hi bhul gaya. mainne socha shaayad abhi tak gaur nahi kiya. pahachaan lega. thodi moti ho gai hoon. shaayad isaliye nahi pahachaana. main udaas ho gai. 

jis shakhs ko jeevan me kabhi bhula hi nahi pai usako mera chehara hi yaad nahi 

maana ki ye auraton aur ladakiyon ko taadane ki isaki aadat nahi magar pahachaane bhi nahi.. 

shadishuda hai. main bhi shaadishuda hun jaanati thi isake saath rahana mushkil hai magar isaka matalab yah to nahi ki apane khayaalo ko apane sapano ko jeena chhod doon. 

ek tamanna thi ki kuchh pal khul ke usake saath gujaarun. maahaul dostaana hi ho magar ho to sahi.. 

aaj vahi shakhs paas baitha tha jise school time se maine dil me basa rakha tha. social media par usake saare acount chori chhupe dekha karati thi. usaki har kavita, har shaayari mein khud ko khoja karati thi. vah to aaj pahachaan hi nahi raha... 

maana ki ham logon mein kabhi pyaar ki peenge nahi chali. na kabhi ijahaar hua. haan vo hamesha meri care karata tha, aur main usaki care karati thi. collage chhuta to meri shaadi ho gai aur vo fauj mein chala gaya. phir usaki shaadi hui. jab bhi gaanv gai usaki saari khabar le aati thi. 

bas aise hi jindagi gujar gai. aadhe ghante se upar ho gaya. vo aaraam se khidaki ke paas baitha mobile mein laga tha. dekhana to door chehara bhi upar nahi kiya...  

main kabhi mobile mein dekhati kabhi usaki taraf. social media par usake acount khol kar dekhe. tasveer milai. vahi tha. pakka vahi. koi shak nahi tha. vaise bhi ham mahilaen pahachaanane mein kabhi bhi dhokha nahi kha sakati. 20 saal baad bhi sirf aankhon se pahachaan le.. 

phir aur kuchh vakt gujara. maahaul vaisa ka vaisa tha. main bas pahalu badalati rahi. 

phir achaanak T.T aa gaya. sabase tikit puchh raha tha. 

mainne apana tikit dikha diya. usase puchha to usane kaha nahi hai. 

T.T bola, "fine lagega" 

vah bola, "laga do" 

T.T, " kahaan ka tikit banaun?" 

usane jalde se javaab nahi diya. meri taraf dekhane laga. main kuchh samajhi nahi. 

usane mere haath me thami tikit ko gaur se dekha phir T.T se bola, " kaanapur." 

T.T ne kaanapur ki tikit bana kar di. aur paise lekar chala gaya. 

vah phir se mobile mein talleen ho gaya. 

aakhir mujhase raha nahi gaya. mainne puchh hi liya,"kaanapur mein kahaan rahate ho?" 

vah mobile mein najaren gadhaye huye hi bola, " kaheen nahi" 

vah chup ho gaya to main phir boli, "kisi kaam se ja rahe ho" 

vah bola, "haan" 

ab mai chup ho gai. vah ajanabi ki tarah baat kar raha tha aur ajanabi se kaise puchh loon kis kaam se ja rahe ho. kuchh der chup rahane ke baad phir 

mainne puchh hi liya, "vahaan shaayad aap naukari karate ho?" 

usane kaha,"nahi" mainne phir himmat kar ke puchha "to kisi se milane ja rahe ho?" 

vahee sankshipt uttar ,"nahi" 

aakhari javaab sunakar meri himmat nahi hui ki aur bhi kuchh puchhoon. ajeeb aadami tha . bina kaam safar kar raha tha. 

main munh fer kar apane mobile mein lag gai. 

kuchh der baad khud hi bola, " ye bhi puchh lo kyon ja raha hoon kaanapur?" 

mere munh se jaldi mein nikala," batao, kyon ja rahe ho?" 

phir apane hi utaavalepan par mujhe sharm si aa gai. 

usane thoda sa muskaraate huve kaha, " ek puraani dost mil gai. jo aaj akele safar par ja rahi thi. fauji aadami hoon. suraksha karana mera kartavy hai . akele kaise jaane deta. isaliye use kaanapur tak chhodane ja raha hoon. " itana sunakar mera dil jor se dhadaka. normal nahi rah saki main. 

magar man ke bhaavon ko dabaane ka asafal prayatn karate hue maine himmat kar ke phir puchha, " kahaan hai vo dost?" 

kamabakht phir muskaraata hua bola," yaheen mere paas baithi hai na" 

itana sunakar mere sab kuchh samajh me aa gaya. ki kyon usane tikit nahi liya. kyonki use to pata hi nahi tha main kahaan ja rahi hoon. sirf aur sirf mere liye vah dilli se kaanapur ka safar kar raha tha. jaan kar itani khushi mili ki aankhon mein aansu aa gaye. 

dil ke bheetar ek gola sa bana aur phat gaya. parinaam mein aankhe to bhigani hi thi. 

bola, "ro kyon rahi ho?" 

mai bas itana hi kah pai," tum mard ho nahi samajh sakate" 

vah bola, " kyonki thoda bahut likh leta hoon isaliye ek kavi aur lekhak bhi hoon. sab samajh sakata hoon." 

mainne khud ko sambhaalate hue kaha "shukriya, mujhe pahachaanane ke liye aur mere liye itana time nikaalane ke liye" 

vah bola, "pletafarm par akeli ghoom rahi thi. koi saath nahi dikha to aana pada. kal hi raksha bandhan tha. isaliye bahut bheed hai. tumako yoon akele safar nahi karana chaahiye." 

"kya karati, unako chhutti nahi mil rahi thi. aur bhai yahaan dilli mein aakar bas gaye. raakhi baandhane to aana hi tha." mainne majaboori batai. 

"aise bhaiyon ko raakhi baandhane aai ho jinako ye bhi fikr nahi ki bahan itana lamba safar akele kaise karegi?"

 "bhai shaadi ke baad bhai rahe hi nahi. bhaabhiyon ke ho gaye. mammi paapa rahe nahi." 

kah kar main udaas ho gai. 

vah phir bola, "to pati ko to samajhana chaahiye." "

unaki bahut busey life hai main jyaada distarb nahi karati. aur aajakal itana khatara nahi raha. kar leti hun main akele safar. tum apani sunao kaise ho?" 

"achchha hoon, kat rahi hai jindagi" 

"meri yaad aati thi kya?" mainne himmat kar ke puchha. 

vo chup ho gaya. kuchh nahi bola to main phir boli, "sorry, yoon hi poochh liya. ab to paripakv ho gaye hain. kar sakate hai aisi baat." 

usane shart ki baaji kee buttan khol kar haath me pahana vo taambe ka kada dikhaaya jo mainne hi friendship day par use diya tha. bola, " yaad to nahi aati par kamabakht ye teri yaad dila deta tha." 

kada dekh kar dil ko bahut shukun mila. main boli "kabhi sampark kyon nahi kiya?" 

vah bola," distarb nahi karana chaahata tha. tumhaari apani jindagi hai aur meri apani jindagi hai." 

mainne darate darate puchha," tumhe chhu lun" 

vah bola, " paap nahi lagega?" 

mai boli," nahi chhu ne se nahi lagata." 

aur phir main kaanapur tak usaka haath pakad kar baithi rahi.. 

bahut si baaten hueen. jindagi ka ek aisa yaadagaar din tha jise aakhari saans tak nahi bula paungi. 

vah mujhe surakshit ghar chhod kar gaya. ruka nahi. baahar se hi chala gaya. 

jammu thi usaki duty . chala gaya. 

usake baad usase kabhi baat nahi hui . kyonki ham donon ne ek dusare ke phone numbar nahi liye. 

haanlaanki hamaare beech kabhi bhi naapaak kuchh bhi nahi hua. ek pavitr sa rishta tha. magar rishto ki garima banaye rakhana jaruri tha. 

phir theek ek maheene baad mainne akhbaar mein padha ki vo desh ke liye shaheed ho gaya. kya gujari hogi mujh par vardan nahi kar sakati. usake parivaar par kya gujari hogi. pata nahee..

 lok laaj ke dar se main usake antim darshan bhi nahi kar saki. 

aaj usase mile ek saal ho gaya hai aaj bhi rakhabandhan ka doosara din hai aaj bhi safar kar rahi hoon. dilli se kaanapur ja rahi hoon. jaanabujhakar journal dibbe ka tikit liya hai mainne. 

akeli hoon. na jaane dil kyon aas paale baitha hai ki aaj phir aayega aur paseena sukhaane ke liye usi khidaki ke paas baithega. 

ek safar vo tha jisame koi hamasafar tha. 

ek saphar aaj hai jisame usaki yaaden hamasafar hai. baaki jindagi ka safar jaari hai dekhate hai kaun milata hai kaun saath chhodata hai...

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