Saturday, November 30, 2019

राजेश रेड्डी जी की लोकप्रिय ग़ज़लें और शेर, rajesh reddy shayari, quotes, status, poetry in hindi,

rajesh reddy poetry
image source, ©www.gul-dasta.blogspot.com

मस्कार दोस्तों आजकल यह आर्टिकल लोकप्रिय शायर राजेश रेड्डी जी के कुछ चुनिंदा गजल और शेरों पर आधारित है

राजेश रेड्डी जी का जन्म 22 जुलाई 1952 को नागपुर में हुआ था राजेश रेड्डी जी के अब तक 3 ग़ज़ल संग्रह उड़ान, आसमान से आगे, व, वजूद, प्रकाशित हो चुके हैं|

राजेश रेड्डी जी अपने अलग अंदाज में शेर पढ़ने के लिए भी जाने जाते हैं | इनकी गजलों को पंकज उदास, जगजीत सिंह, भूपेंद्र, और राजकुमार रिजवी, ने गाया है |

तो चलिए पढ़ते हैं,  राजेश रेड्डी जी की लोकप्रिय ग़ज़लें और शेर

rajesh reddy shayari in hindi


राजेश रेड्डी के 20 मशहूर शेर 



मैं ही सबब था अब के भी अपनी शिकस्त का इल्ज़ाम अब की बार भी क़िस्मत के सर गया

इजाज़त कम थी जीने की मगर मोहलत ज़ियादा थी हमारे पास मरने के लिए फ़ुर्सत ज़ियादा थी

सफ़र में अब के अजब तजरबा निकल आया भटक गया तो नया रास्ता निकल आया

किसी दिन ज़िंदगानी में करिश्मा क्यूँ नहीं होता मैं हर दिन जाग तो जाता हूँ ज़िंदा क्यूँ नहीं होता

rajesh reddy kavita image
dil bhi ek zid pe ada hai 

दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं



सर क़लम होंगे कल यहाँ उन के जिन के मुँह में ज़बान बाक़ी है



बड़ी तस्वीर लटका दी है अपनी जहाँ छोटा सा आईना था पहले

दिन को दिन रात को मैं रात न लिखने पाऊँ उन की कोशिश है कि हालत न लिखने पाऊँ

जुस्तुजू का इक अजब सिलसिला ता-उम्र रहा ख़ुद को खोना था कहीं और कहीं ढूँढना था

क्या जाने किस जहाँ में मिलेगा हमें सुकून नाराज़ हैं ज़मीं से ख़फ़ा आसमाँ से हम

rajesh reddy poems image
milte nahi hai apni kahani
मिलते नहीं हैं अपनी कहानी में हम कहीं ग़ायब हुए हैं जब से तेरी दास्ताँ से हम




बुलंदी के लिए बस अपनी ही नज़रों से गिरना था हमारी कम-नसीबी हम में कुछ ग़ैरत ज़ियादा थी

दिल भी बच्चे की तरह ज़िद पे अड़ा था अपना जो जहाँ था ही नहीं उस को वहीं ढूँढना था

कुछ इस तरह गुज़ारा है ज़िंदगी को हम ने जैसे कि ख़ुद पे कोई एहसान कर लिया है

दोस्तों का क्या है वो तो यूँ भी मिल जाते हैं मुफ़्त रोज़ इक सच बोल कर दुश्मन कमाने चाहिएँ

ज़िंदगी तो कभी नहीं आई मौत आई ज़रा ज़रा कर के

आईने से उलझता है जब भी हमारा अक्स हट जाते हैं बचा के नज़र दरमियाँ से हम





rajesh reddy poems hindi me
khilona hai jo mitti ka
यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है . खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है

ऐसे न बिछड़ आँखों से अश्कों की तरह तू आ लौट के आ फिर तिरी यादों की तरह तू

कुछ परिंदों को तो बस दो चार दाने चाहिएँ कुछ को लेकिन आसमानों के ख़ज़ाने चाहिएँ




 राजेश रेड्डी की कुछ लोकप्रिय ग़ज़लें / rajesh reddy shayari



ये जो ज़िन्दगी की किताब है


 ये जो ज़िन्दगी की किताब है ये किताब भी क्या किताब है|
  कहीं इक हसीन सा ख़्वाब है कहीं जान-लेवा अज़ाब है|

कहीं छाँव है कहीं धूप है कहीं और ही कोई रूप है,
कई चेहरे इस में छुपे हुए इक अजीब सी ये नक़ाब है|

कहीं खो दिया कहीं पा लिया कहीं रो लिया कहीं गा लिया,
कहीं छीन लेती है हर ख़ुशी कहीं मेहरबान बेहिसाब है|

कहीं आँसुओं की है दास्ताँ कहीं मुस्कुराहटों का बयाँ,
कहीं बर्क़तों की है बारिशें कहीं तिश्नगी बेहिसाब है|

rajesh reddy ke poem
ye jo zindgi ki kitab hai 

शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ


शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं
   मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं

जानता हूँ रेत पर वो चिलचिलाती धूप है
जाने किस उम्मीद में फिर भी उधर जाता हूँ मैं

सारी दुनिया से अकेले जूझ लेता हूँ कभी
और कभी अपने ही साये से भी डर जाता हूँ मैं

ज़िन्दगी जब मुझसे मज़बूती की रखती है उमीद
फ़ैसले की उस घड़ी में क्यूँ बिखर जाता हूँ मैं

आपके रस्ते हैं आसाँ आपकी मंजिल क़रीब
ये डगर कुछ और ही है जिस डगर जाता हूँ मैं

rajesh reddy shayari on life
sham ko jis waqt ghar khali

अब क्या बताएँ टूटे हैं 


अब क्या बताएँ टूटे हैं कितने कहाँ से हम
 ख़ुद को समेटते हैं यहाँ से वहाँ से हम

क्या जाने किस जहाँ में मिलेगा हमें सुकून
नाराज़ हैं ज़मीं से ख़फ़ा आसमाँ से हम

अब तो सराब ही से बुझाने लगे हैं प्यास
लेने लगे हैं काम यक़ीं का गुमाँ से हम

लेकिन हमारी आँखों ने कुछ और कह दिया
कुछ और कहते रह गए अपनी ज़बाँ से हम

आईने से उलझता है जब भी हमारा अक्स
हट जाते हैं बचा के नज़र दरमियाँ से हम

मिलते नहीं हैं अपनी कहानी में हम कहीं
ग़ाएब हुए हैं जब से तिरी दास्ताँ से हम

ग़म बिक रहे थे मेले में ख़ुशियों के नाम पर
मायूस हो के लौटे हैं हर इक दुकाँ से हम

ज़िन्दगी तूने लहू ले के


ज़िन्दगी तूने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं|
तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं|

मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशि ले लो,
मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं|

हमने देखा है कई ऐसे ख़ुदाओं को यहाँ,
सामने जिन के वो सच मुच का ख़ुदा कुछ भी नहीं|

या ख़ुदा अब के ये किस रंग से आई है बहार,
ज़र्द ही ज़र्द है पेड़ों पे हरा कुछ भी नहीं|

दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है. किसी बच्चे की तरह,
या तो सब कुछ ही इसे चाहिये या कुछ भी नहीं|

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zindgi tune lahu leke diya kuch bhi nahi 

मिट्टी का जिस्म लेके मैं


मिट्टी का जिस्म लेके मैं पानी के घर में हूँ,
मंज़िल है मेरी मौत, मैं हर पल सफ़र में हूँ

होना है मेरा क़त्ल ये मालूम है मुझे,
लेकिन ख़बर नहीं कि मैं किसकी नज़र में हूँ

पीकर भी ज़हरे-ज़िन्दगी ज़िन्दा हूँ किस तरह
जादू ये कौन-सा है, मैं किसके असर में हूँ

अब मेरा अपने दोस्त से रिश्ता अजीब है,
हर पल वो मेरे डर में है, मैं उसके डर में हूँ

मुझसे न पूछिए मेरे साहिल की दूरियाँ,
मैं तो न जाने कब से भँवर-दर-भँवर में हूँ

यूँ देखिये तो आंधी में 


यूँ देखिये तो आंधी में बस इक शजर गया,
लेकिन न जाने कितने परिन्दों का घर गया

जैसे ग़लत पते पे चला आए कोई शख़्स,
सुख ऐसे मेरे दर पे रुका और गुज़र गया

मैं ही सबब था अबके भी अपनी शिकस्त का,
इल्ज़ाम अबकी बार भी क़िस्मत के सर गया

अर्से से दिल ने की नहीं सच बोलने की ज़िद,
हैरान हूँ मैं कैसे ये बच्चा सुधर गया

उनसे सुहानी शाम का चर्चा न कीजिए,
जिनके सरों पे धूप का मौसम ठहर गया

जीने की कोशिशों के नतीज़े में बारहा,
महसूस ये हुआ कि मैं कुछ और मर गया

रोज़ सवेरे दिन का निकलना


रोज़ सवेरे दिन का निकलना, शाम में ढलना जारी है,
जाने कब से रूहों का ये ज़िस्म बदलना जारी है

तपती रेत पे दौड़ रहा है दरिया की उम्मीद लिए,
सदियों से इन्सान का अपने आपको छलना जारी है

जाने कितनी बार ये टूटा जाने कितनी बार लुटा,
फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है

बरसों से जिस बात का होना बिल्कुल तय सा लगता था,
एक न एक बहाने से उस बात का टलना जारी है

तरस रहे हैं एक सहर को जाने कितनी सदियों से,
वैसे तो हर रोज़ यहाँ सूरज का निकलना जारी है

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roj sabere din ka nikalna 

ख़ज़ाना कौन सा उस पार होगा


ख़ज़ाना कौन सा उस पार होगा
वहाँ भी रेत का अम्बार होगा

ये सारे शहर में दहशत सी क्यूँ है
यक़ीनन कल कोई त्यौहार होगा

बदल जाएगी उस बच्चे की दुनिया
जब उस के सामने अख़बार होगा

उसे नाकामियाँ ख़ुद ढूँड लेंगी
यहाँ जो साहब-ए-किरदार होगा

समझ जाते हैं दरिया के मुसाफ़िर
जहाँ मैं हूँ वहाँ मंजधार होगा

ज़माने को बदलने का इरादा
कहा तो था तुझे बेकार होगा

रंग मौसम का हरा था पहले


रंग मौसम का हरा था पहले
पेड़ ये कितना घना था पहले

मैं ने तो बाद में तोड़ा था इसे
आईना मुझ पे हँसा था पहले

जो नया है वो पुराना होगा
जो पुराना है नया था पहले

बाद में मैं ने बुलंदी को छुआ
अपनी नज़रों से गिरा था पहले

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मोड़ कर अपने अन्दर की दुनिया से मुँह


मोड़ कर अपने अन्दर की दुनिया से मुँह,
हम भी दुनिया-ए-फ़ानी के हो जाएँ क्या।
जान कर भी कि ये सब हक़ीक़त नहीं,
झूटी-मूटी कहानी के हो जाएँ क्या।

कब तलक बैठे दरिया किनारे यूँ ही,
फ़िक्र दरिया के बारे में करते रहें,
डाल कर अपनी कश्ती किसी मौज पर,
हम भी उसकी रवानी के हो जाएँ क्या।

सोचते हैं कि हम अपने हालात से,
कब तलक यूँ ही तकरार करते रहें,
हँसके सह जाएँ क्या वक़्त का हर सितम,
वक़्त की मेहरबानी के हो जाएँ क्या।

ज़िन्दगी वो जो ख़्वाबों-ख़्यालों में है,
वो तो शायद मयस्सर न होगी कभी,
ये जो लिक्खी हुई इन लकीरों में है,
अब इसी ज़िन्दगानी के हो जाएँ क्या।

हमने ख़ुद के मआनी निकाले वही,
जो समझती रही है ये दुनिया हमें,
आईने में मआनी मगर और हैं,
आईने के मआनी के हो जाएँ क्या।

हमने सारे समुन्दर तो सर कर लिए,
उनके सारे ख़ज़ाने भी हाथ आ चुके,
अब ज़रा अपने अन्दर का रुख़ करके हम,

दूर तक गहरे पानी के हो जाएँ क्या।

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