Thursday, March 26, 2020

बचपन में पढ़ी कुछ चुनिन्दा हिन्दी कविताएँ, पोएम | hindi kavitayen, poetry, poem

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bachpan poetry in hindi नमस्कार दोस्तों- बचपन का जमाना हम सभी के जीवन का सबसे यादगार वक्त होता है, बचपन की शरारतों को याद करके हर कोई अपने बचपन को एक बार फिर से जीना चाहता है 

क्योंकि बचपन आदमी के जीवन का सबसे प्यारा और मासूम समय होता है, जिसमें ना तो किसी प्रकार का टेंशन होता था और ना किसी तरह का भय, बस अपनी ही दुनिया में मगन रहते थे 

आज का यह पोस्ट भी hindi ki kavitayen उन कविताओं पर आधारित है, जिन्हें आपने अपने स्कूल के दिनों में जरूर पढ़ा होगा 

तो चलिए पेश है बचपन में पढ़ीं हिन्दी कविताएं, hindi kavitayen, hindi ki kavitayen, best kavitayen in hindi, hindi poetry, hindi poem, hindi mein kavitayen, kavitayen in hindi, bachpan poem in hindi, poetry in hindi  इनको पढ़कर आपको अपने बचपन की यादें एक बार फिर से ताजा हो जाएंगी

1.उठो लाल अब आँखे खोलो (hindi kavitayen, hindi kavitayen)

उठो लाल अब आँखें खोलो,

पानी लायी हूँ मुंह धो लो।

बीती रात कमल दल फूले,

उसके ऊपर भँवरे झूले,

चिड़िया चहक उठी पेड़ों पे,

बहने लगी हवा अति सुंदर,

नभ में प्यारी लाली छाई,

धरती ने प्यारी छवि पाई।

भोर हुई सूरज उग आया,

जल में पड़ी सुनहरी छाया,

नन्ही नन्ही किरणें आई,

फूल खिले कलियाँ मुस्काई,

इतना सुंदर समय मत खोओ,

मेरे प्यारे अब मत सोओ।

 - अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध


utho laal ab aankhen kholo, 

paanee laayi hoon munh dho lo. 

beeti raat kamal dal phoole, 

usake upar bhanvare jhoole, 

chidiya chahak uthi pedon pe, 

bahane lagi hava ati sundar, 

nabh mein pyaari laali chhai, 

dharati ne pyaari chhavi pai. 

bhor hui sooraj ug aaya, 

jal mein padi sunahari chhaaya, 

nanhi nanhi kiranen aai, 

phool khile kaliyaan muskai, 

itana sundar samay mat khovo, 

mere pyaare ab mat sovo. 

- ayodhya singh upaadhyay hariaudh


2. वीर तुम बढ़े चलो, (hindi ki kavitayen, कविता हिंदी में लिखी हुई)

वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो।

हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे,

ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं,

वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो।

सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो,

तुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहीं,

वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो।

प्रात हो कि रात हो संग हो न साथ हो,

सूर्य से बढ़े चलो चन्द्र से बढ़े चलो,

वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो।

एक ध्वज लिये हुए एक प्रण किये हुए,

मातृ भूमि के लिये पितृ भूमि के लिये,

वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो।

अन्न भूमि में भरा वारि भूमि में भरा,

यत्न कर निकाल लो रत्न भर निकाल लो,

वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो।

   - द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

veer tum badhe chalo, 

dheer tum badhe chalo. 

haath mein dhwaja rahe baal dal saja rahe, 

dhwaj kabhi jhuke nahin dal kabhi ruke nahin, 

veer tum badhe chalo! dheer tum badhe chalo. 

saamane pahaad ho singh ki dahaad ho, 

tum nidar daro nahin tum nidar dato vaheen, 

veer tum badhe chalo! dheer tum badhe chalo. 

praat ho ki raat ho sang ho na saath ho, 

suray se badhe chalo chandr se badhe chalo, 

veer tum badhe chalo! dheer tum badhe chalo. 

ek dhwaj liye huye ek pran kiye huye, 

maatr bhoomi ke liye pitr bhoomi ke liye, 

veer tum badhe chalo! dheer tum badhe 

chalo. 

ann bhoomi mein bhara vaari bhoomi mein bhara, 

yatn kar nikaal lo ratn bhar nikaal lo, 

veer tum badhe chalo! dheer tum badhe chalo. 

- dwarika prasad maaheshvari


3. पुष्प की अभिलाषा, (प्रसिद्ध हिंदी कविताएँ, hindi poetry) 

चाह नहीं, मैं सुरबाला के

गहनों में गूँथा जाऊँ,

चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध

प्यारी को ललचाऊँ,

चाह नहीं सम्राटों के शव पर

हे हरि डाला जाऊँ,

चाह नहीं देवों के सिर पर

चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ,

मुझे तोड़ लेना बनमाली,

उस पथ पर देना तुम फेंक।

मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने,

जिस पथ पर जावें वीर अनेक।

  - माखनलाल चतुर्वेदी

chaah nahin, main surabaala ke 

gahanon mein goontha jaoon, 

chaah nahin premi-maala mein bindh 

pyaari ko lalachaoon, 

chaah nahin samraaton ke shav par 

he hari daala jaoon, 

chaah nahin devon ke sir par 

chadhoon bhaagy par ithalaoon, 

mujhe tod lena banamaali, 

us path par dena tum fenk. 

maatr-bhoomi par sheesh- chadhaane, 

jis path par jaaven veer anek. 

- makhanalal chaturvedi


4. बड़े सवेरे मुर्गा बोला (सबसे अच्छी कविता, hindi mein kavitayen)

बड़े सवेरे मुर्गा बोला,

चिड़ियों ने अपना मुँह खोला,

आसमान में लगा चमकने ,

लाल-लाल सोने का गोला ,

ठंडी हवा बही सुखदायी

सब बोले दिन निकला भाई।

bade savere murga bola, 

chidiyon ne apana munh khola, 

aasamaan mein laga chamakane , 

laal-laal sone ka gola , 

thandi hava bahi sukhadayi 

sab bole din nikala bhai.


5. फूलवाली (hindi poem, हिंदी बाल कविता)

फूल-सी हो फूलवाली।

किस सुमन की साँस तुमने

आज अनजाने चुरा ली,

जब प्रभा की रेख दिनकर ने

गगन के बीच खींची,

तब तुम्हीं ने भर मधुर

मुस्कान कलियाँ सरस सींची,

किंतु दो दिन के सुमन से,

कौन-सी यह प्रीति पाली?

प्रिय तुम्हारे रूप में

सुख के छिपे संकेत क्यों हैं?

और चितवन में उलझते,

प्रश्न सब समवेत क्यों हैं?

मैं करूँ स्वागत तुम्हारा,

भूलकर जग की प्रणाली।

तुम सजीली हो, सजाती हो

सुहासिनि, ये लताएँ,

क्यों न कोकिल कण्ठ

मधु ऋतु में, तुम्हारे गीत गाएँ,

जब कि मैंने यह छटा,

अपने हृदय के बीच पा ली,

फूल सी हो फूलवाली।

 - रामकुमार वर्मा

phool-si ho phoolwali. 

kis suman ki saans tumane 

aaj anajaane chura li, 

jab prabha ki rekh dinakar ne 

gagan ke beech kheenchi, 

tab tumhin ne bhar madhur 

muskaan kaliyaan saras seenchi, 

kintu do din ke suman se, 

kaun-si yah preeti paali? 

priy tumhaare roop mein 

sukh ke chhipe sanket kyon hain? 

aur chitavan mein ulajhate, 

prashn sab samavet kyon hain? 

main karoon swagat tumhaara, 

bhoolakar jag ki pranaali. 

tum sajeeli ho, sajaati ho 

suhaasini, ye latayen, 

kyon na kokil kanth 

madhu ritu mein, tumhaare geet gayen, 

jab ki mainne yah chhata, 

apane hriday ke beech pa li, 

phool si ho phoolawali. 

- ramkumar varma


6. चल रे मटके टम्मक टू (प्रसिद्ध बाल कविताएँ, bachpan poem in hindi)

हुए बहुत दिन बुढ़िया एक

चलती थी लाठी को टेक,

उसके पास बहुत था माल

जाना था उसको ससुराल,

मगर राह में चीते शेर

लेते थे राही को घेर,

बुढ़िया ने सोची तदबीर

जिससे चमक उठी तक़दीर,

मटका एक मंगाया मोल

लंबा लंबा गोल मटोल,

उसमे बैठी बुढ़िया आप

वह ससुराल चली चुपचाप,

बुढ़िया गाती जाती यूँ

चल रे मटके टम्मक टूँ।

huye bahut din budhiya ek 

chalati thi laathi ko tek, 

usake paas bahut tha maal 

jaana tha usako sasuraal, 

magar raah mein cheete sher 

lete the raahi ko gher, 

budhiya ne sochi tadabeer 

jisase chamak uthi taqadeer, 

mataka ek mangaaya mol 

lamba lamba gol matol, 

usame baithi budhiya aap 

vah sasuraal chali chupchaap, 

budhiya gaati jaati yoon 

chal re matake tammak tun.

7. मैने छुटपन मे छिपकर पैसे बोये थे (कविता हिंदी में, hindi mein kavitayen)

मैने छुटपन मे छिपकर पैसे बोये थे

सोचा था पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे ,

रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी ,

और, फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूगा 

पर बन्जर धरती में एक न अंकुर फूटा ,

बन्ध्या मिट्टी ने एक भी पैसा उगला 

सपने जाने कहां मिटे , कब धूल हो गये ।

मै हताश हो , बाट जोहता रहा दिनो तक ,

बाल कल्पना के अपलक पांवड़े बिछाकर 

मै अबोध था, मैने गलत बीज बोये थे ,

ममता को रोपा था , तृष्णा को सींचा था 

अर्धशती हहराती निकल गयी है तबसे ।

कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने

ग्रीष्म तपे , वर्षा झूलीं , शरदें मुसकाई

सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे ,खिले वन 

औ' जब फिर से गाढी ऊदी लालसा लिये

गहरे कजरारे बादल बरसे धरती पर

मैने कौतूहलवश आँगन के कोने की

गीली तह को यों ही उँगली से सहलाकर

बीज सेम के दबा दिए मिट्टी के नीचे 

भू के अन्चल मे मणि माणिक बाँध दिए हों 

मै फिर भूल गया था छोटी से घटना को।

और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन 

किन्तु एक दिन , जब मै सन्ध्या को आँगन मे

टहल रहा था- तब सह्सा मैने जो देखा ,

उससे हर्ष विमूढ़ हो उठा मै विस्मय से 

देखा आँगन के कोने मे कई नवागत

छोटी छोटी छाता ताने खडे हुए है 

छाता कहूँ कि विजय पताकाएँ जीवन की;

या हथेलियाँ खोले थे वे नन्हीं ,प्यारी 

जो भी हो , वे हरे हरे उल्लास से भरे

पंख मारकर उडने को उत्सुक लगते थे

डिम्ब तोडकर निकले चिडियों के बच्चे से 

निर्निमेष , क्षण भर मै उनको रहा देखता

सहसा मुझे स्मरण हो आया कुछ दिन पहले ,

बीज सेम के रोपे थे मैने आँगन मे

और उन्ही से बौने पौधौं की यह पलटन

मेरी आँखो के सम्मुख अब खडी गर्व से ,

नन्हे नाटे पैर पटक , बढ़ती जाती है 

तबसे उनको रहा देखता धीरे धीरे

अनगिनती पत्तो से लद भर गयी झाडियाँ

हरे भरे टँग गये कई मखमली चन्दोवे

बेलें फैल गई बल खा , आँगन मे लहरा

और सहारा लेकर बाड़े की टट्टी का

हरे हरे सौ झरने फूट ऊपर को

मै अवाक रह गया वंश कैसे बढता है

यह धरती कितना देती है  "धरती माता"

कितना देती है अपने प्यारे पुत्रो को

नहीं समझ पाया था मै उसके महत्व को

बचपन मे , छि: स्वार्थ लोभवश पैसे बोकर

रत्न प्रसविनि है वसुधा , अब समझ सका हूँ 

इसमे सच्ची समता के दाने बोने है

इसमे जन की क्षमता के दाने बोने है

इसमे मानव ममता के दाने बोने है

जिससे उगल सके फिर धूल सुनहली फसले

मानवता की - जीवन क्ष्रम से हँसे दिशाएं

हम जैसा बोएँगे वैसा ही पाएँगे।

     - सुमित्रानंदन पंत

maine chhutapan me chhipakar paise boye the 

socha tha paison ke pyaare ped ugenge , 

rupayon ki kaldaar madhur fasalen khanakengi , 

aur, phool phalakar mai mota seth banooga 

par banjar dharati mein ek na ankur phoota , 

bandhya mitti ne ek bhi paisa ugala 

sapane jaane kahaan mite , kab dhul ho gaye . 

mai hataash ho , baat johata raha dino tak , 

baal kalpana ke apalak paanvade bichhakar 

mai abodh tha, maine galat beej boye the , 

mamata ko ropa tha , trshna ko seencha tha 

ardhshati haharatee nikal gayi hai tabase . 

kitane hi madhu patjhar beet gaye anjaane 

grishm tape , varsha jhulin , sharden musakai 

si-si kar hemant kanpe, taru jhare ,khile van 

au jab phir se gaadhi udi laalasa liye

 gahare kajaraare baadal barase dharati par 

maine kautuhalavash aangan ke kone ki 

geeli tah ko yon hi ungali se sahalaakar 

beej sem ke daba diye mitti ke niche 

bhoo ke anchal me mani maanik baandh diye hon 

mai phir bhool gaya tha chhoti se ghatana ko. 

aur baat bhi kya thi yaad jise rakhata man 

kintu ek din , jab mai sandhya ko aangan me 

tahal raha tha- tab sahsa maine jo dekha , 

usase harsh vimoodh ho utha mai vismay se 

dekha aangan ke kone me kai navagat 

chhoti chhoti chhata taane khade hue hai 

chhata kahoon ki vijay patakaen jeevan ki; 

ya hatheliyaan khole the ve nanhin ,pyaari 

jo bhee ho , ve hare hare ullaas se bhare 

pankh maarkar udane ko utsuk lagate the 

dimb todakar nikale chidiyon ke bachche se 

nirnimesh , kshan bhar mai unako raha dekhata 

sahasa mujhe ismaran ho aaya kuchh din pahale , 

beej sem ke rope the maine aangan me 

aur unhi se baune paudhon ki yah palatan 

meree aankho ke sammukh ab khadi garv se , 

nanhe naate pair patak , badhati jaati hai 

tabase unako raha dekhata dheere dheere 

anginati patto se lad bhar gayi jhaadiyaan 

hare bhare tang gaye kai makhamali chandove 

belen fail gai bal kha , aangan me lahara 

aur sahaara lekar baade koi tatti ka 

hare hare sau jharane phoot upar ko 

mai avaak rah gaya vansh kaise badhata hai 

yah dharati kitana deti hai "dharatee maata" 

kitana deti hai apane pyaare putro ko 

nahin samajh paaya tha mai usake mahatv ko 

bachapan me , chhi: swarth lobhvash paise bokar 

ratn prasavini hai vasudha , ab samajh saka hoon 

isame sachchi samata ke daane bone hai 

isame jan ki kshamata ke daane bone hai 

isame maanav mamata ke daane bone hai 

jisase ugal sake phir dhool sunahali fasale 

maanavata ki - jeevan kshram se hanse dishayen 

ham jaisa boenge vaisa hi payenge. 

- sumitranandan pant 


8. थाल सजाकर किसे पूजने (hindi poetry, poem in hindi)

थाल सजाकर किसे पूजने चले प्रात ही मतवाले,

कहा चले तुम राम नाम का पीताम्बर तन पर डाले ।

इधर प्रयाग न गंगा सागर इधर न रामेश्वर काशी,

इधर कहा है तीर्थ तुम्हारा कहा चले तुम सन्यासी ।

चले झूमते मस्ती से क्या तुम अपना पथ आये भूल,

कहा तुम्हारा दीप जलेगा कहा चढ़ेगा माला फूल ।

मुझे न जाना गंगा सागर मुझे न रामेश्वर काशी,

तीर्थराज चित्तौड़ देखने को मेरी आँखे प्यासी ।

अपने अटल स्वतंत्र दुर्ग पर सुनकर वैरी की बोली,

निकल पड़ी लेकर तलवारें जहाँ जवानों की टोली ।

जहाँ आन पर माँ बहनों ने जल-जला पवन होली,

वीर मंडली गर्वित स्वर में जय माँ की जय-जय बोली ।

सुन्दरियों ने जहाँ देश हित जौहर व्रत करना सीखा,

स्वतंत्रता के लिए जहाँ पर बच्चों ने भी मरना सीखा ।

वही जा रहा पूजा करने लेने सतियों की पद धूल,

वही हमारा दीप जलेगा वही चढेगा माला फूल ।

जहाँ पदमिनी जौहर व्रत करती चढ़ी चिता की ज्वाला पर,

क्षण भर वही समाधी लगी बैठ इसी मृग छाला पर ।

            - श्यामनारायण पाण्डेय

thaal sajaakar kise poojane chale praat hi matavaale, 

kaha chale tum raam naam ka peetaambar tan par daale . 

idhar prayaag na ganga saagar idhar na raameshvar kaashi, 

idhar kaha hai teerth tumhara kaha chale tum sanyaasi .

chale jhoomate masti se kya tum apana path aaye bhool, 

kaha tumhaara deep jalega kaha chadhega maala phool . 

mujhe na jaana ganga saagar mujhe na raameshvar kaashi, 

teerthraaj chittaud dekhane ko meri aankhe pyaasi . 

apane atal svatantr durg par sunakar vairi ki boli, 

nikal padi lekar talawaren jahaan jawanon ki toli . 

jahaan aan par maan bahanon ne jal-jala pavan holi, 

veer mandali garvit swar mein jay maan ki jay-jay boli .

sundariyon ne jahaan desh hit jauhar vrat karana seekha, 

svatantrata ke liye jahaan par bachchon ne bhi marana seekha . 

vahee ja raha pooja karane lene satiyon ki pad dhool, 

vahi hamaara deep jalega vahi chadhega maala phool . 

jahaan padmini jauhar vrat karati chadhi chita ki jwala par, 

kshan bhar vahi samaadhi lagi baith isi mrg chhaala par . 

- shyamnarayan pandey


9.चांद का कुर्ता (poetry in hindi, हिन्दी कविताएँ )

हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला

सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला,

सन-सन चलती हवा रात भर जाड़े से मरता हूँ

ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ।

आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का

न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही को भाड़े का,

बच्चे की सुन बात, कहा माता ने 'अरे सलोने`

कुशल करे भगवान, लगे मत तुझको जादू टोने।

जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ

एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ,

कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा

बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा।

घटता-बढ़ता रोज, किसी दिन ऐसा भी करता है

नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है,

अब तू ही ये बता, नाप तेरी किस रोज लिवायें

सी दे एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आये ।

      - रामधारी सिंह "दिनकर"

hath kar baitha chaand ek din, maata se yah bola 

silava do maan mujhe oon ka mota ek jhingola, 

san-san chalati hawa raat bhar jaade se marata hoon 

thithur-thithur kar kisi tarah yaatra poori karata hoon. 

aasamaan ka safar aur yah mausam hai jaade ka 

na ho agar to la do kurta hi ko bhaade ka, 

bachche ki sun baat, kaha maata ne are salone` 

kushal kare bhagwaan, lage mat tujhako jaadoo tone. 

jaade ki to baat theek hai, par main to darati hoon 

ek naap mein kabhi nahin tujhako dekha karati hoon, 

kabhi ek angul bhar chauda, kabhi ek fut mota 

bada kisi din ho jaata hai, aur kisi din chhota. 

ghatata-badhata roj, kisi din aisa bhi karata hai 

nahin kisi ki bhi aankhon ko dikhalai padata hai, 

ab tu hi ye bata, naap teri kis roj liwayen 

see de ek jhingola jo har roj badan mein aaye . 

- raamdhari singh "dinkar"


11.चन्दन है इस देश की माटी (famous poetry in hindi, कविता हिंदी में लिखी हुई)

चन्दन है इस देश की माटी

तपोभूमि हर ग्राम है,

हर बाला देवी की प्रतिमा

बच्चा बच्चा राम है,

जहां के सैनिक समरभूमि में

गाया करते गीता है,

जहां खेत में हल के नीचे

खेला करती सीता है,

ज्ञान जहां का गंगाजल सा

निर्मल हर अभिराम है ।

chandan hai is desh ki maati 

tapobhoomi har graam hai, 

har baala devi ki pratima 

bachcha bachcha ram hai, 

jahaan ke sainik samarbhoomi mein 

gaaya karate geeta hai, 

jahaan khet mein hal ke neeche khela

 karati seeta hai, 

gyaan jahaan ka gangaajal sa 

nirmal har abhiraam hai .

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    वह आता....

    दो टूक कलेजे के करता

    पछताता, पथ पर आता

    पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,

    चल रहा लकुटिया टेक...

    मुट्ठी भर दाने को, भूख मिटाने को,

    मुंह फटी पुरानी झोली का फैलाता...

    दो टूक कलेजे के करता

    पछताता पथ पर आता,

    साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाए

    बाएं से वे मलते पेट को चलते,

    और दाहिना दयादृष्टि पाने की ओर बढ़ाए...

    भूख से सूख ओंठ जब जाते

    दाता भाग्य विधाता से क्या पाते...

    घूंट आंसुओं के पीकर रह जाते...

    चाट रहे हैं जूठी पत्तल कभी सड़क पर खड़े हुए,

    और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए ।

     - सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

    vah aata.... 

    do took kaleje ke karata 

    pachhtata, path par aata 

    pet peeth donon milakar hain ek, 

    chal raha lakutiya tek... 

    mutthi bhar daane ko, bhookh mitaane ko, 

    munh fati purani jholi ka failata... 

    do took kaleje ke karata 

    pachhatata path par aata, 

    saath do bachche bhi hain sada haath failaye 

    bayen se ve malate pet ko chalate, 

    aur dahina dayadrshti paane ki or badhaye... 

    bhookh se sukh onth jab jaate 

    daata bhaagy vidhaata se kya paate... 

    ghunt aansuon ke peekar rah jaate... 

    chaat rahe hain joothi pattal kabhi sadak par khade huye, 

    aur jhapat lene ko unase kutte bhi hain ade hue . 

    - surayakant tripathi "nirala"


    13. बारहमासी (हिंदी में लिखी हुई कविताएँ, bachpan poem in hindi)

    चैत लिये फूलों की डाली

    महकाने को आता,

    लू के झोंकों में पलकर

    वैषाख तभी आ जाता।

    और ज्येष्‍ठ दुपहर भर तपकर

    आंधी पानी लाता,

    वर्षा के रिमझिम गीतों को

    गा आषाढ़ सुनाता।

    राखी के धागों में बंधकर

    सावन झूम झुलाता,

    नदी और सागर में पानी

    भरने भादों आता।

    लिये कांस के फूल गोद में

    क्वांर तभी मुसकाता,

    ज्वार बाजरे की बालों से

    कार्तिक खेत सजाता।

    अगहन गन्नों में रस भरता

    खेतों को लहराता,

    कंबल और रजाई की यादें

    पूस ही ताजा करता।

    माघ देखकर सरसों फूली

    फूला नहीं समाता,

    फागुन आमों की बौरों से

    बागों को महकाता।

    chait liye phoolon ki daali 

    mahakaane ko aata, 

    loo ke jhonkon mein palakar 

    vaishakh tabhi aa jaata. 

    aur jyesh‍th dupahar bhar tapakar 

    aandhi paani laata, 

    varsha ke rimajhim geeton ko 

    ga aashadh sunaata. 

    raakhi ke dhaagon mein bandhakar 

    saavan jhoom jhulaata, 

    nadi aur saagar mein paani 

    bharane bhaadon aata. 

    liye kaans ke phool god mein 

    kvaanr tabhi musakaata, 

    jwar baajare ki baalon se 

    kaartik khet sajaata. 

    agahan gannon mein ras bharata 

    kheton ko laharaata, 

    kambal aur rajai ki yaaden 

    poos hi taaja karata. 

    maagh dekhakar sarason phooli 

    phoola nahin samaata, 

    phalgun aamon ki bauron se 

    baagon ko mahakaata. 


    14. पथ मेरा आलोकित कर दो (सबसे अच्छी कविता, छोटी सी कविता हिंदी में)

    पथ मेरा आलोकित कर दो

     नवल प्रात की रश्मियों से

    मेरे उर का तम हर दो।

    मैं नन्हा-सा पथिक विश्व के

    पथ पर चलना सीख रहा हूँ,

    मैं नन्हा-सा विहग विश्व के

    नभ पर उड़ना सीख रहा हूँ,

    पहुँच सकूं निर्दिष्ट लक्ष्य पर

    मुझको ऐसे पग दो,पर दो।

    पाया जग से जितना अब तक

    और अभी जितना मैं पाऊँ,

    मनोकामना है यह मेरी

    उससे कहीं अधिक दे जाऊँ,

    धरती को ही स्वर्ग बनाने का

    मुझको मंगलमय वर दो।

    path mera aalokit kar do 

    naval praat ki rashmiyon se 

    mere ur ka tam har do. 

    main nanha-sa pathik vishv ke 

    path par chalana seekh raha hoon, 

    main nanha-sa vihag vishv ke 

    nabh par udana seekh raha hoon, 

    pahunch sakoon nirdisht lakshy par 

    mujhako aise pag do,par do. 

    paaya jag se jitana ab tak 

    aur abhi jitana main paoon, 

    manokaamana hai yah meree 

    usase kaheen adhik de jaoon, 

    dharati ko hi swarg banaane ka 

    mujhako mangalamay var do.

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    15. बन्दर मुझे बना दे राम (हिंदी बाल कविता, famous kavitayen in hindi)

    बन्दर मुझे बना दे राम,

    लम्बी पूँछ लगा दे राम

    पेडो पर चढ़ जाऊँगा,

    मीठे फल मैं खाऊँगा

    सब को खूब हँसाऊँगा ।

    bandar mujhe bana de ram, 

    lambi poonchh laga de ram 

    pedo par chadh jaunga, 

    meethe fal main khaunga 

    sab ko khoob hansaunga .


    16. बसंती हवा (हिंदी कविता, hindi poetry)

    हवा हूँ, हवा मैं

    बसंती हवा हूँ।

            सुनो बात मेरी..

            अनोखी हवा हूँ

            बड़ी बावली हूँ,

            बड़ी मस्तमौला

            नहीं कुछ फिकर है,

            बड़ी ही निडर हूँ

            जिधर चाहती हूँ,

            उधर घूमती हूँ,

            मुसाफिर अजब हूँ।

    न घर-बार मेरा,

    न उद्देश्य मेरा,

    न इच्छा किसी की,

    न आशा किसी की,

    न प्रेमी न दुश्मन,

    जिधर चाहती हूँ

    उधर घूमती हूँ।

    हवा हूँ, हवा मैं

    बसंती हवा हूँ ।

            जहाँ से चली मैं

            जहाँ को गई मैं 

            शहर, गाँव, बस्ती,

            नदी, रेत, निर्जन,

            हरे खेत, पोखर,

            झुलाती चली मैं।

            झुमाती चली मैं

            हवा हूँ, हवा मै

            बसंती हवा हूँ।

    चढ़ी पेड़ महुआ,

    थपाथप मचाया;

    गिरी धम्म से फिर,

    चढ़ी आम ऊपर,

    उसे भी झकोरा,

    किया कान में 'कू',

    उतरकर भगी मैं,

    हरे खेत पहुँची 

    वहाँ, गेंहुँओं में

    लहर खूब मारी।

            पहर दो पहर क्या,

            अनेकों पहर तक

            इसी में रही मैं

            खड़ी देख अलसी

            लिए शीश कलसी,

            मुझे खूब सूझी 

            हिलाया-झुलाया

            गिरी पर न कलसी।

            इसी हार को पा,

            हिलाई न सरसों,

            झुलाई न सरसों,

            हवा हूँ, हवा मैं

            बसंती हवा हूँ ।

    मुझे देखते ही

    अरहरी लजाई,

    मनाया-बनाया,

    न मानी, न मानी;

    उसे भी न छोड़ा 

    पथिक आ रहा था,

    उसी पर ढकेला;

    हँसी ज़ोर से मैं,

    हँसी सब दिशाएँ,

    हँसे लहलहाते

    हरे खेत सारे,

    हँसी चमचमाती

    भरी धूप प्यारी;

    बसंती हवा में

    हँसी सृष्टि सारी

    हवा हूँ, हवा मैं

    बसंती हवा हूँ ।

    - केदारनाथ अग्रवाल

    hawa hoon, hawa main 

    basanti hawa hoon. 

    suno baat meri.. 

    anokhi hawa hoon 

    badi bavali hoon, 

    badi mastamaula 

    nahin kuchh fikar hai, 

    badi hi nidar hoon 

    jidhar chaahati hoon, 

    udhar ghumati hoon, 

    musaafir ajab hoon. 

    na ghar-baar mera, 

    na uddeshy mera, 

    na ichchha kisi ki, 

    na aasha kisi ki, 

    na premi na dushman, 

    jidhar chaahati hoon 

    udhar ghoomati hoon. 

    hawa hoon, hawa main 

    basantee hawa hoon . 

    jahaan se chali main 

    jahaan ko gai main 

    shahar, gaanv, basti, 

    nadi, ret, nirjan, 

    hare khet, pokhar, 

    jhulaati chali main. 

    jhumaatee chali main 

    hawa hoon, hawa mai 

    basanti hawa hoon. 

    chadhi ped mahua, 

    thapaathap machaaya; 

    giri dhamm se phir, 

    chadhi aam upar, 

    use bhi jhakora, 

    kiya kaan mein koo, 

    utarakar main bhagi, 

    hare khet pahunchi 

    vahaan, genhunon mein 

    lahar khoob maari. 

    pahar do pahar kya, 

    anekon pahar tak 

    isi mein rahi main 

    khadi dekh alasi 

    liye sheesh kalasi, 

    mujhe khoob sujhi 

    hilaaya-jhulaaya 

    giri par na kalasi. 

    isee haar ko pa, 

    hilai na sarason, 

    jhulai na sarason, 

    hawa hoon, hawa main 

    basantee hawa hoon . 

    mujhe dekhate hi 

    arahari lajai, 

    manaaya-banaaya, 

    na maani, na maani; 

    use bhee na chhoda 

    pathik aa raha tha, 

    usi par dhakela; 

    hansi zor se main, 

    hansi sab dishaen, 

    hanse lahalahaate 

    hare khet saare, 

    hansi chamachamaati 

    bhari dhoop pyaari; 

    basantee hawa mein 

    hansi srshti saari 

    hawa hoon, hawa main 

    basantee hawa hoon . 

    - kedaranath agrwal

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    17. माँ कह एक कहानी (bachpan poem in hindi, hindi ki kavitayen)

    माँ कह एक कहानी।

     बेटा समझ लिया क्या 

    तूने मुझको अपनी नानी?

    "कहती है मुझसे यह चेटी, 

    तू मेरी नानी की बेटी,

    कह माँ कह लेटी ही लेटी, 

    राजा था या रानी?

    माँ कह एक कहानी।

     तू है हठी, मानधन मेरे, 

    सुन उपवन में बड़े सवेरे,

    तात भ्रमण करते थे तेरे, 

    जहाँ सुरभि मनमानी,

     जहाँ सुरभि मनमानी,

    हाँ माँ यही कहानी।

     वर्ण वर्ण के फूल खिले थे, 

    झलमल कर हिमबिंदु झिले थे,

    हलके झोंके हिले मिले थे, 

    लहराता था पानी,

     लहराता था पानी, 

    हाँ हाँ यही कहानी।

     गाते थे खग कल कल स्वर से, 

    सहसा एक हँस ऊपर से,

    गिरा बिद्ध होकर खर शर से, 

    हुई पक्षी की हानी,

     हुई पक्षी की हानी? 

    करुणा भरी कहानी।

     चौंक उन्होंने उसे उठाया, 

    नया जन्म सा उसने पाया,

    इतने में आखेटक आया, 

    लक्ष सिद्धि का मानी,

    "लक्ष सिद्धि का मानी,

    कोमल कठिन कहानी।

     माँगा उसने आहत पक्षी, 

    तेरे तात किन्तु थे रक्षी,

    तब उसने जो था खगभक्षी, 

    हठ करने की ठानी,

     हठ करने की ठानी, 

    अब बढ़ चली कहानी।

     हुआ विवाद सदय निर्दय में, 

    उभय आग्रही थे स्वविषय में,

    गयी बात तब न्यायालय में, 

    सुनी सब ने जानी।

     सुनी सब ने जानी,

    व्यापक हुई कहानी।

    राहुल तू निर्णय कर इसका, 

    न्याय पक्ष लेता है किसका?

    कह दो निर्भय जय हो जिसका, 

    सुन लूँ तेरी वाणी,

     माँ मेरी क्या बानी? 

    मैं सुन रहा कहानी।

    कोई निरपराध को मारे 

    तो क्यों न अन्य उसे उबारे?

    रक्षक पर भक्षक को वारे, 

    न्याय दया का दानी,

     न्याय दया का दानी, 

    तूने गुणी कहानी।

     - मैथिलीशरण गुप्त

    maa kah ek kahaani. 

    beta samajh liya kya 

    tune mujhako apani naani? 

    "kahati hai mujhase yah cheti, 

    tu meri naani ki beti, 

    kah maa kah leti hi leti, 

    raja tha ya rani? 

    maa kah ek kahaani. 

    tu hai hathi, maanadhan mere, 

    sun upvan mein bade savere, 

    taat bhrman karate the tere, 

    jahaan surabhi manamaani, 

    jahaan surabhi manamaani, 

    haan maa yahi kahaani. 

    varn varn ke phool khile the, 

    jhalamal kar himabindu jhile the, 

    halake jhonke hile mile the, 

    laharata tha pani, 

    laharata tha pani, 

    haan haan yahi kahaani. 

    gaate the khag kal kal swar se, 

    sahasa ek hans upar se, 

    gira biddh hokar khar shar se, 

    hui pakshi ki haani, 

    hui pakshi ki haani? 

    karuna bhari kahaani. 

    chaunk unhonne use uthaaya, 

    naya janm sa usane paya, 

    itane mein aakhetak aaya, 

    laksh siddhi ka maani, 

    "laksh siddhi ka maani, 

    komal kathin kahaani. 

    maanga usane aahat pakshi, 

    tere taat kintu the rakshi, 

    tab usane jo tha khagbhakshi, 

    hath karane ki thaani, 

    hath karane ki thaani, 

    ab badh chali kahaani. 

    hua vivad saday nirday mein, 

    ubhay aagrahi the svavishay mein, 

    gayi baat tab nyayaalay mein, 

    suni sab ne jaani. 

    suni sab ne jaani, 

    vyaapak hui kahaani. 

    raahul tu nirnay kar isaka, 

    nyaay paksh leta hai kisaka? 

    kah do nirbhay jay ho jisaka, 

    sun loon teri vaani, 

    maan meri kya baani? 

    main sun raha kahaani. 

    koi niraparaadh ko maare 

    to kyon na any use ubaare? 

    rakshak par bhakshak ko vaare, 

    nyaay daya ka daani, 

    nyaay daya ka daani, 

    tune guni kahaani. 

    - maithelisharan gupt


    18. अगर पेड भी चलते होते (बच्चों की बाल कविता, hindi poems)

    अगर पेड भी चलते होते

    कितने मजे हमारे होते,

    बांध तने में उसके रस्सी

    चाहे जहाँ कहीं ले जाते

    जहाँ कहीं भी धूप सताती

    उसके नीचे झट सुस्ताते,

    जहाँ कहीं वर्षा हो जाती

    उसके नीचे हम छिप जाते,

    लगती भूख यदि अचानक

    तोड मधुर फल उसके खाते,

    आती कीचड-बाढ क़हीं तो

    झट उसके उपर चढ ज़ाते,

    अगर पेड भी चलते होते

    कितने मजे हमारे होते

     - डॉ. दिविक रमेश

    agar ped bhi chalate hote 

    kitane maje hamaare hote, 

    baandh tane mein usake rassi 

    chaahe jahaan kaheen le jaate 

    jahaan kaheen bhi dhoop sataati 

    usake neeche jhat sustaate, 

    jahaan kaheen varsha ho jaati 

    usake neeche ham chhip jaate, 

    lagati bhookh yadi achaanak 

    tod madhur fal usake khaate, 

    aati keechad-baadh kaheen to 

    jhat usake upar chadh jate, 

    agar ped bhi chalate hote 

    kitane maje hamaare hote - 

    dr. divik ramesh


    19. पापा क्यों अच्छा लगता है (hindi kavitayen, प्रसिद्ध हिंदी कविताएँ)

    पापा क्यों अच्छा लगता है

    अपना प्यारा-प्यारा घर?

    घूम-घाम लें, खेल-खाल लें

    नहीं भूलता लेकिन घर।

    नहीं आपको लगता पापा

    है माँ की गोदी-सा घर,

    प्यारी-प्यारी ममता वाला

    सुंदर-सुंदर न्यारा घर।

    थककर जब वापस आते हैं

    कैसे बिछ-बिछ जाता घर,

    खिला-पिला आराम दिलाकर

    नई ताजगी देता घर।

    पर पापा, इक बात बताओ

    नहीं न होता सबका घर,

    क्या करते होंगे वे बच्चे

    जिनके पास नहीं है घर?

      - डॉ. दिविक रमेश

    papa kyon achchha lagata hai 

    apana pyara-pyara ghar? 

    ghoom-ghaam len, khel-khaal len 

    nahin bhulata lekin ghar. 

    nahin aapako lagata papa 

    hai maa ki godi-sa ghar, 

    pyaari-pyaari mamata wala 

    sundar-sundar nyaara ghar. 

    thakakar jab wapas aate hain 

    kaise bichh-bichh jaata ghar, 

    khila-pila aaraam dilaakar 

    nai taajagi deta ghar. 

    par paapa, ik baat batao 

    nahin na hota sabaka ghar, 

    kya karate honge ve bachche 

    jinake paas nahin hai ghar? 

    - dr. divik ramesh


    तो दोस्तों- यह थी बचपन में पढ़ी गई कुछ चुनिंदा hindi kavitayen, hindi ki kavitayen, best kavitayen in hindi, hindi poetry, hindi poem, hindi mein kavitayen, kavitayen in hindi, bachpan poem in hindi  अगर आपको यह पोस्ट पसंद आई हो तो इसे, अपने बचपन के दोस्तों के साथ सोशल मीडिया पर भी शेयर करें 
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